निजी अस्पतालों में 52.5 फीसदी प्रसव ऑपरेशन से, सरकारी में सिर्फ 19.2
गाजियाबाद। जनपद में निजी अस्पतालों में सामान्य से ज्यादा अब ऑपरेशन से प्रसव हो रहे हैं, जबकि सरकारी में तस्वीर जुदा है। निजी में कुल प्रसव के 52.5 प्रतिशत ऑपरेशन से हो रहे हैं जबकि सरकारी में सिर्फ 19.2 प्रतिशत। यह रिपोर्ट हाल ही में जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे ( एनएफएचएस-5 ) की है। इसकी पड़ताल करने पर दो कारण सामने आए हैं। एक तो दर्द रहित प्रसव के लिए महिलाएं ?ऑपरेशन ( सिजेरियन डिलीवरी ) को प्राथमिकता दे रही हैं। दूसरा, सरकारी अस्पतालों में सर्जन की कमी है। ऐसे में सिजेरिजयन डिलीवरी के लिए महिलाएं निजी अस्पताल में जाने के लिए मजबूर हैं। नतीजा यह है कि निजी अस्पतालों में चार साल में सिजेरियन डिलीवरी 22 प्रतिशत बढ़ गई हैं।
2015-16 और 2020-21 की रिपोर्ट की तुलना में अच्छी बात यह है कि संस्थागत प्रसव ( अस्पताल में डिलीवरी ) बढ़ रहे हैं। पांच साल पहले यह 68.3 प्रतिशत थी, जबकि अब 86.4 प्रतिशत है। अभी भी 13.6 फीसदी बच्चे घर में ही जन्म ले रहे हैं। हालांकि, इनमें भी 88 फीसदी से ज्यादा प्रसव प्र?शिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की देखरेख में हो रहे हैं। वर्ष 2021 में अब तक निजी अस्पतालों में कुल प्रसव 59917 हुए हैं जबकि सरकारी में 12164 । सरकारी अस्पताल के मुकाबले निजी में प्रसव ज्यादा हो रहे हैं। इसकी वजह यह है कि सरकारी में सुविधाएं कम हैं। नगरीय क्षेत्र में सरकारी अस्पताल में प्रसव होने पर एक हजार और ग्रामीण क्षेत्र में 1400 रुपये मिलते हैं। पहले प्रसव पर 7500 रुपये मिलते हैं।
निजी अस्पताल में जाना मजबूरी
जिले में सिर्फ महिला अस्पताल और संयुक्त अस्पताल में ही सिजेरियन प्रसव होते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डासना, मोदीनगर, मुरादनगर और लोनी में सिजेरियन डिलीवरी के लिए आने वाली महिलाओं को रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में महिलाएं निजी अस्पताल में जाने पर मजबूर हो जाती हैं। हालांकि, सरकारी में भी पांच साल में सिजेरियन डिलीवरी सात फीसदी बढ़ी है।
खर्च 1.50 लाख रुपये तक
प्राइवेट अस्पतालों में सामान्य प्रसव के लिए 30 से 50 हजार रुपये लिए जाते हैं, जबकि सिजेरियन के लिए 60 हजार से 1.50 लाख रुपये लेते हैं। बड़े अस्पतालों में यह खर्च और भी बढ़ जाता है। इलाज खर्च ज्यादा होने पर भी साल दर साल सिजेरियन डिलीवरी बढ़ रही है।
महिलाएं चाहती हैं दर्द रहित प्रसव
महिला रोग विशेषज्ञ एवं आईएमए की संयुक्त सचिव डॉ अल्पना कंसल का कहना है कि कामकाजी महिलाएं एपिड्यूरल डिलीवरी (दर्द रहित प्रसव) चाहती हैं। सामान्य प्रसव में दर्द होता है। इससे सिजेरियन डिलीवरी की संख्या बढ़ जाती है। कई बार महिलाओं में एल्ड्राइड पेल्विस (पुरुष की तरह कूल्हा), हाइड्रोकिफैलस (बच्चे का सिर बड़ा होने), बच्चा पेट में उल्टा होने, गले में नाल चिपक जाने पर भी सिजेरियन डिलीवरी कराना मजबूरी हो जाता है।
वर्ष सिजेरियन डिलीवरी ( सरकारी ) सिजेरियन डिलीवरी ( निजी )
2015-16 12.4 प्रतिशत 30.1 प्रतिशत
2020-21 19.2 प्रतिशत 52.5 प्रतिशत
सिजेरियन के नुकसान भी
सर्जन डॉ. जीपी मथूरिया का कहना है कि सिजेरियन ?डिलीवरी के बाद अगर सावधानी न बरती जाए तो हार्निया और पाइल्स की परेशानी हो जाती है। इसके अलावा बेडरेडिन (बेड पर लेटने) से मोटापा बढ़ता है, सबसे अधिक दिक्कत होती है कि बच्चे को कोलेस्ट्रम(मां का पहला पीला दूध) नहीं मिल पाता है। इससे बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है।