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दफ्तर में करने लगे काम तो दूर हो गया मानसिक तनाव

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amar ujala - फोटो : amar ujala
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दफ्तर में करने लगे काम तो दूर हो गया मानसिक तनाव
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गाजियाबाद। दो साल में कोरोना ने हजारों घर बर्बाद किए, किसी का सुहाग उजड़ा तो किसी की गोद सूनी हो गई। उससे भी अधिक खतरनाक हुआ कि कमाने वाले की मौत होने से घर चलाने और बच्चों को पालने की चिंता बढ़ गई। वहीं, ज्यादातर लोगों में वर्क फॉर्म होम और घर में रहने से अवसाद के लक्षण दिखे। दफ्तर खुलने और अनलॉक होने से अब हालात में धीरे-धीरे सुधर रहे हैं।
लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के लिए 10 अक्तूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस बार वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ (डब्ल्यूएफएमएच) ने एक असमान दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य थीम रखी है। मानसिक रोग विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक रोगियों को दुत्कारने के बजाय उनसे प्यार करें इससे उनके स्वास्थ्य में जल्दी सुधार होगा।
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एमएमजी अस्पताल के साइकोलॉजिस्ट डॉ. साकेतनाथ तिवारी का कहना है कि दो साल बाद अब मरीजों की संख्या में कमी आई है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा एक सर्वे किया गया था, जिसमें यह बात खुलकर सामने आई कि अब लोग डिप्रेशन से बाहर आने लगे हैं। सर्वे के अनुसार कोरोना काल में डिप्रेशन की दर 70 प्रतिशत से ज्यादा पर पहुंच गई थी, लेकिन अब इसमें सुधार हो रहा है। फिलहाल 10 में से 2 लोग अब भी डिप्रेशन के शिकार हैं, इनमें अधिकांश महिलाएं एवं युवा शामिल हैं। सर्वे में कोरोना की दूसरी लहर के समय 21 प्रतिशत लोग डिप्रेस्ड थे, वहीं अब सिर्फ 17 प्रतिशत लोग ही अवसाद से जूझ रहे हैं।
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वरिष्ठ साइकोलॉजिस्ट डॉ. संजीव त्यागी का कहना है कि संवेदना सोसायटी फॉर मेंटल हेल्थ के सर्वे में पाया गया कि लॉकडाउन सामाजिक अलगाव, नौकरी में कटौती, महामारी को लेकर आशंका सहित कई कारणों की वजह से लोग अवसाद में जा रहे हैं। कोरोना के मामले कम होने पर पाबंदी हटा ली, इसके बाद लोग इधर-उधर जा पा रहे हैं, इसी कारण मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होने लगा है। 21 जुलाई से 15 अगस्त के बीच जब सर्वे किया गया तो 6 में से दो लोगों ने बताया कि वे किसी न किसी रूप में अवसादग्रस्त हुए है। महिलाओं में अवसाद का स्तर पुरुषों के मुकाबले ज्यदा था। 16 साल से 29 साल के बीच तीन में से एक महिला अवसाद से जूझ रही थी, जबकि इस उम्र में सिर्फ 20 प्रतिशत पुरुषों को अवसाद से झेलना पड़ा था।
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