गाजियाबाद। बैंक प्रबंधक ने खाताधारकों की 100 करोड़ 47 लाख की जमा पूंजी अपने चहेते बिल्डर और कारोबारियों को लोन के तौर पर लुटाई। रिजर्व बैंक की गाइडलाइन का उल्लंघन कर बिना हैसियत देखे लोन स्वीकृति किए गए, जिनकी हैसियत 50 लाख रुपये की भी नहीं थी, उन्हें 5 से 10 करोड़ तक का लोन दे दिया। बैंक को चेक डिस्काउंटिंग लोन दो लाख रुपये तक का देने का अधिकार था, लेकिन करोड़ों रुपये के लोन के चेक पास कर दिए।
आरबीआई द्वारा बैंक का लाइसेंस निरस्त किए जाने के वक्त बैंक के पास 37588 खाताधारक थे, जिनकी बड़ी रकम डूब गई। इन्हें खाताधारकों में से 1452 लोगों पर बैंक की बड़ी रकम फंसी है, जिसमें से नौ लोगों की संपत्ति अटैच भी की जा चुकी है। शासन के निर्देश पर बीते वर्ष सितंबर में सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक सहकारिता ने बैंक संचालकों की अशोक नगर, राजनगर और संजय नगर की संपत्तियों को अटैच किया, जिनकी कीमत करीब 15 से 20 करोड़ आंकी गई।
बैंक ने 37 करोड़ रुपये का लोन ऐसे लोगों को दे दिया जो डिफाल्टर की श्रेणी में हैं। इन्हीं पर अब लोन की धनराशि पेनल्टी के साथ बढ़कर 70 करोड़ तक पहुंच गई है जिसकी रिकवरी के कहीं कोई आसार नहीं दिखते। ऑडिट से पता चलता है कि अच्छी साख रखने वाले खाताधारकों को बैंक ने चूना लगाया। अच्छी साख वाले खाताधारकों ने ब्याज समेत लोन की धनराशि लौटाई, लेकिन बैंक ने मास्टर रोल में लोन बरकरार रखा और उनकी तरफ से जमा धनराशि को दूसरे लोगों को लोन के रूप में बांट दिया। इस तरह से करोड़ों का लोन बैंक से बाहर ही चलता रहा।
128 लोगों पर मेहरबान हुआ बैंक प्रबंधन
बैंक की गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर और हापुड़ को मिलाकर छह शाखाएं थीं। गाजियाबाद में संजयनगर और नई बस्ती, गौतमबुद्धनगर में दादरी, सूरजपुर तथा सेक्टर-59 में एक-एक शाखा संचालित थी, जिसका संचालन रिजर्व बैंक से लाइसेंस निरस्त होने के बाद अगस्त 2017 के बाद बंद हुआ। ऑडिट से पता चला कि बैंक ने 128 लोगों को उनकी हैसियत (क्रेडिट वेल्यू) से अधिक का लोन दिया। इनमें बिल्डर, ठेकेदार, व्यापारी और कई निजी कंपनियां भी शामिल हैं। लोन देते वक्त उनसे गारंटी भी जमा नहीं की गई। बल्कि साधारण पत्रों पर लोन दे दिया।
बिल्डर थे पार्टनर
कई बिल्डरों के साथ बैंक संचालकों की पार्टनरशिप भी है। ऑडिट के दौरान उसके कुछ शुरूआती साक्ष्य मिले हैं। सहकारिता विभाग को आशंका है कि बैंक प्रमोटर्स (संचालकों) ने जनता की जमा पूंजी को फर्जी तरीके से लोन स्वीकृति करके अपने दूसरे कारोबार में लगाया। इसलिए अब सरकार चाहती है कि मामले की अलग से जांच हो। इसे लेकर भी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।