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Ghaziabad News: राष्ट्रीय लोक अदालत में 48 हजार निस्तारित, फिर भी 3.48 लाख केस लंबित

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गाजियाबाद। हर तीन महीने में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय लोक अदालत के बावजूद मुकदमों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है। शनिवार को संपन्न हुई लोक अदालत में 48 हजार से अधिक केस निस्तारित होने के बावजूद रविवार को नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के अनुसार 3.48 लाख से अधिक केस लंबित हैं। पिछले एक नवंबर तक यह आंकड़ा 2.98 लाख था। यह स्थिति दर्शाती है कि मामलों के समाधान की गति और मुकदमों के दाखिल होने की प्रक्रिया में समानता से पीड़ित को समय पर सुलभ न्याय मिलने में बाधा आ रही है।
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राष्ट्रीय लोक अदालत में शनिवार को 48,210 केसों का निस्तारण किया गया था। इसके अलावा सामान्य दिनों की सुनवाई में एक महीने में औसतन 3,833 केसों का निस्तारण हुआ है, लेकिन हर महीने 7 से 8 हजार नए मुकदमे दाखिल हो रहे हैं, जिससे लंबित मुकदमों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। अदालत के अधिकारियों का कहना है कि यह स्थिति जमानत अर्जी, नए मुकदमे और अदालतों में हो रही दवाब की वजह से उत्पन्न हो रही है।


मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में 33 हजार केस लंबित

सर्वाधिक लंबित केस मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में हैं, जहां लगभग 33 हजार केस लंबित हैं। इसके अलावा एसीजेएम (अधीनस्थ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट) कोर्ट एक में 24 हजार से अधिक, एसीजेएम तृतीय में 26 हजार से अधिक, एसीजेएम पांच में 15 हजार, सप्तम में 18 हजार से अधिक केस लंबित हैं। जबकि अपर सत्र न्यायाधीश स्तर पर 1200 से लेकर 3800 केस तक विचाराधीन हैं। अदालत के एक अधिकारी ने बताया कि एक ही केस में कई बार गवाही और संबंधित दस्तावेज पेश करने में ही कई महीने लग जाते हैं। इस कारण से केस लंबित रहते हैं।
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केसों में निस्तारण में आई है तेजी
जिला शासकीय अधिवक्ता राजेश चंद्र शर्मा का कहना है कि मुकदमों के निस्तारण की गति में तेजी आई है, और न्यायाधीशों की नियुक्तियां भी पूरी हो चुकी हैं, लेकिन जब तक कोर्ट के पोर्टल से मामले हटेंगे नहीं, तब तक लंबित केसों की संख्या में कमी नहीं आएगी।

खाली अदालत और कम संसाधन से बढ़ रही केसों की संख्या
वहीं, अधिवक्ता डॉ. राजकुमार चौहान का कहना है कि लंबित मुकदमों की प्रमुख वजह है अदालतों में कर्मचारियों और न्यायाधीशों की कमी के कारण सुनवाई प्रभाावित हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि अदालतों के पास जितने मामले आते हैं, बढ़ते मुकदमे के निपटारे के लिए पर्याप्त संसाधन और समय नहीं मिल पाता है।
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