हिडन और गंगनहर में दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन पर एनजीटी ने रोक लगा दी है। इस आदेश के बाद प्रशासन ने प्रतिमा विसर्जन के लिए गंगनहर और हिंडन पुल के पास कच्चे (अस्थाई) तालाब की खुदाई शुरू करा दी है।
आयोजकों का कहना है कि पहले वे विसर्जन के लिए गंगनहर ही जाएंगे, वहां विसर्जन से रोके जाने पर अपने द्वारा बनाए गए टैंक में प्रतिमा विसर्जित करेंगे।
प्रदूषित होती नदियों के हित में एनजीटी ने किसी भी नदी में विसर्जन पर रोक लगा दी है। हाल ही में गणेश की प्रतिमा विसर्जन पर वाराणसी में हुए बवाल की घटनाओं से सबक लेते हुए प्रशासन और दुर्गा पूजा आयोजकों ने विसर्जन की वैकल्पिक व्यवस्था की है।
प्रशासन ने विसर्जन के लिए गंगनहर के पास ही अस्थायी तालाब खुदवाया है। तालाब में गंगनहर से पानी भरा जाएगा। यहीं पर लोगों से प्रतिमा विसर्जन के लिए कहा जाएगा।
सीडीओ कृष्णा करुणेश ने बताया कि लोगों की आस्था को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्था की गई है। दूसरी ओर कालीबाड़ी मंदिर में दुर्गा पूजा आयोजन समिति के मीडिया प्रभारी सौरभ भट्टाचार्य ने बताया कि वे लोग हर वर्ष गंगनहर में ही मूर्ति विसर्जित करते हैं।
सौरभ ने बताया कि एनजीटी के रोक को देखते हुए वे लोग पहले से ही विसर्जन की वैकल्पिक व्यवस्था की योजना तैयार कर रहे है।
प्रशासन यदि कोई तालाब खुदवा रहा है तो समिति तालाब में ही मूर्ति विसर्जित करेगी। इसके बाद प्रशासन अस्थायी तालाब को भर भी दे तो समिति को कोई दिक्कत नहीं है।
मूर्ति विसर्जन से अब मैली नहीं होगी गंगा
लोगों के धर्म और आस्था को देखते हुए पर्यावरण वैज्ञानिकों ने प्रतिमा विसर्जन से होने वाले प्रदूषण से गंगा को बचाने का विकल्प तलाश लिया है। अब प्रतिमा का निर्माण ईको फ्रेंडली पदार्थों से किया जाएगा जो पानी में आसानी से गल जाएंगे। इससे जल प्रदूषण नहीं होगा।
पर्यावरण वैज्ञानिक डा. विवेकराज सिंह ने बताया कि अभी तक मूर्तियों को बनाने में पीओपी, प्लास्टिक, केमिकल मिली मिट्टी, थर्मोकोल, टिन, फाइबर और वाटर कलर का इस्तेमाल हो रहा है।
इससे पैरालाइटिक शैलफिस प्वायजन बनता है। न्यूरोटोक्सिन और सेक्सीटोक्सिन पानी में घुल जाते हैं और अघुलनशील और अक्षरणीय पदार्थ नदियों में जम जाते हैं।
उन्होंने बताया कि मूर्तियों को मुल्तानी मिट्टी, चिकनी मिट्टी, चिकनी दोमट से बनाया जाएगा। इनपर हल्दी-चंदन आदि से रंग चढ़ाया जाएगा।