अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में जिन बलराज मधोक ने जनसंघ को नई राजनीतिक ऊंचाइयां दीं, उन्हीं को संघ के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत निष्कासन के रूप में चुकानी पड़ी थी। जनसंघ की स्थापना में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले मधोक ने ही देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समक्ष सबसे पहले राम जन्म भूमि, काशी विश्वनाथ और मथुरा का श्रीकृष्ण मंदिर हिंदुओं को सौंपने की मांग की थी।
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बलराज मधोक ने दी जनसंघ को राजनीतिक ऊंचाई
- फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
बाद में इसी मुद्दे के सहारे 90 के दशक में भाजपा ने अपनी मजबूत सियासी जमीन तैयार की। मधोक के हाथों में संगठन की कमान रहते जनसंघ को नई राजनीतिक पहचान मिली। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चौथी लोकसभा में जनसंघ गठबंधन के पास 54 सीटें थी।
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बलराज मधोक का अंतिम संस्कार
- फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
60 के दशक में जनसंघ ने पहली बार पंजाब में संयुक्त सरकार बनाने में सफलता हासिल की। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित आठ राज्य में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल किया था। भारतीय राजनीति में भारतीयकरण का मुद्दा भी मधोक की ही देन है।
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अंतिम विदाई में गमगीन माहौल
- फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
अध्यक्ष पद से हटने के बाद साल 1973 में जनसंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मधोक ने इंदिरा सरकार की नीतियों का समर्थन करते हुए संघ की नीतियों का विरोध कर सियासी हलचल पैदा कर दी थी। उन्होंने इंदिरा सरकार की आर्थिक नीतियों, बैंकों के राष्ट्रीयकरण का समर्थन किया था। संघ इसका विरोध कर रहा था।
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- फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
इसी बैठक में मधोक ने जनसंघ में संघ के बढ़ते दखल पर चिंता जाहिर करते हुए संघ के प्रचारक को ही संगठन मंत्री बनाए जाने की परंपरा बंद करने की मांग की थी। इससे नाराज जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने मधोक को पार्टी से तीन साल के लिए निष्कासित कर दिया था। इसके बाद मधोक फिर कभी जनसंघ में नहीं लौटे।
जनसंघ की राजनीति में दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज नेता मधोक के कनिष्ठ थे। वाजपेयी-आडवाणी से पहले जनसंघ की कमान संभाल चुके दीनदयाल, मधोक के अध्यक्ष रहते पार्टी में महासचिव थे। वाजपेयी भी मधोक के जनसंघ से निष्कासन के बाद ही राष्ट्रीय राजनीति का चेहरा बने।