ऋग्वेद में ‘पिता’ शब्द शिशु पालन कर्ता के रूप में माना गया है। बचपन में सिखाए अनुशासन भले ही उस दौरान कड़वे लगते हो, लेकिन सफलता की सीढ़ी चढ़ने के साथ ही उसका बेहतर परिणाम देखने को मिलता है।
पिता न केवल अभिभावक की भूमिका निभाते हैं बल्कि एक दोस्त की तरह भी होते हैं, जो समय-समय पर बेटे या बेटियों को उनकी जरूरतों के मुताबिक कठिन डगर में राह दिखाने का काम करते हैं। आइए मिलते हैं कुछ ऐसे बेटे और बेटी से जिन्हें पिता के संघर्ष ने सफलता के मुकाम पर पहुंचा दिया।
सबसे कम उम्र में माउंट मकालू फतह करने वाले पर्वतारोही अर्जुन वाजपेयी सफलता का श्रेय पिता संजीव वाजपेयी को देते हैं। शुरुआती दौर में पिता को गुरु बनाया जिन्होंने हमेशा अपना रोल निभाया। सेना से रिटायर पिता बेटे को आउटडोर एडवेंचर का मौका देना चाहते थे।
अर्जुन ने पर्वतारोहण में दिलचस्पी दिखाई तो पिता ने एक बार भी नहीं रोका बल्कि साथ दिया। यही नहीं पर्वतारोहण के दौरान वह आज भी टिप्स देते हैं। बकौल अर्जुन, पापा ने ही एवरेस्ट फतह करने को लेकर उत्साह बढ़ाया।
पिछले तीन वर्ष से मकालू फतह नहीं कर पाने पर जब भी चिड़चिड़ापन होता तो पिता उनको भरोसा दिलाते रहे। इस बार भी जब करीब सात दिन तक मौसम खराब रहा तो भरोसा दिलाते रहे और अंत में जीत हुई।
सोच हमेशा सकारात्मक रही : डीएम
fathers day
- फोटो : राजन राय
गौतम बुद्धनगर के जिलाधिकारी एनपी सिंह के पिता आरपी सिंह पश्चिम बंगाल में बिजनेस करते थे। 1972-73 में नक्सलबाड़ी जिले में नक्सली गतिविधियां तेज होने पर उन्हें पूरा कारोबार छोड़कर वाराणसी आना पड़ा।
वाराणसी आने के बाद उन्होंने खेती शुरू की। उस दौरान एनपी सिंह पांचवीं कक्षा के छात्र थे। वह बताते हैं कि पिता जी की एक खासियत यह रही कि उनकी सोच हमेशा सकारात्मक रही। नक्सलियों से नुकसान के बावजूद उन्होंने उनका भला ही सोचा।
नक्सली मूवमेंट वाले कई क्षेत्र में उन्होंने जागरूकता अभियान चलाया जिससे वह सही राह पर चल सकें। उन्होंने मुझे सिखाया कि कभी जब तुम सक्षम बन जाओ तो दूसरों की राह आसान करने में मदद करो। भटके लोगों को सही राह पर लाओ। उन्होंने जीवन में परिवर्तन के दौरान भी संघर्ष करते हुए अनुकूल वातावरण बनाए रखा।
कर्म करने और फल की चिंता न करने का दिया संदेश : अनिल
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- फोटो : राजन राय
अमेरिका से आर्किटेक्ट की पढ़ाई कर चुके अनिल सुतार के पिता राम सुतार पद्म पुरस्कार प्राप्त मूर्तिकार हैं। अनिल सुतार कहते हैं कि पिताजी महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव धुलिया से आए। उस समय वह कुछ भी लेकर नहीं आए थे लेकिन धीरे-धीरे मेहनत के बल पर उन्होंने मुकाम हासिल किया।
पिताजी हमेशा उनको सिखाते रहे हैं कि कोई भी काम मन से करना चाहिए। जितनी जरूरत हो उतना ही खर्च करना चाहिए। यही नहीं दिखावे में कभी भी नहीं रहना चाहिए। आज के समय में जो दिख रहा है वहीं करें। कहते हैं कि एक बार रंजीत सिंह की मूर्ति बनाने का ठेका मिला था।
उस समय पैसा कम पड़ जाने पर उन्होंने लक्ष्मी नगर की स्टूडियो गिरवी रख लोन लेना पड़ा। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और काम पूरा करने के बाद स्टूडियो छुड़ा लिया।
उनका कहना है कि पिता को न जाने कितने अवॉर्ड और सम्मान मिले लेकिन अभिमान उनको कभी नहीं छू सका। उनका एक ही संदेश था कि कर्म करते रहो और फल की चिंता न करो।
पिता मेरे आदर्श हैं : प्रीति
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- फोटो : राजन राय
ग्रेटर नोएडा के रिठौरी गांव की रहने वाली प्रीति ने 2016 की 10वीं बोर्ड परीक्षा में जिले में टॉप किया। खास बात यह कि पिता रविन कुमार ऑटो चलाते हैं। प्रीति पिता को आदर्श मानती हैं और कहती हैं कि सफलता में पूरा योगदान मेरे पापा का है।
उन्होंने मेरे और तीन अन्य भाई बहनों की पढ़ाई के लिए जीतोड़ मेहनत की। पढ़ाई के दौरान जो भी कमी आती उसे वह तुरंत पूरा करते रहे। वह परिवार के लालन पालन के लिए सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक ऑटो चलाते हैं।
पापा का सपना बेटी को आईएएस बनाना है। इसके लिए अभी से ही तैयारी शुरू कर दी। प्रीति कहती है कि जब भी मेरे अंदर निराशा के भाव आते हैं तो पापा उत्साह बढ़ाते हैं। उसका कहना है कि मेरे पापा ही मेरे आदर्श हैं।