-सामाजिक ताने, संसाधनों की कमी को किक मारकर कर रही हैं गोल
गौरव मिश्रा
फरीदाबाद। आज से शुरू हो रहे फीफा विश्व कप को लेकर खिलाड़ियों में उत्साह है। यहां एनआईटी-4 की एक खेल नर्सरी अभ्यास करने वाली लड़कियां भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना चाहती हैं। यहां बेटियां सिर्फ फुटबॉल को किक नहीं मार रही हैं, वे सामाजिक ताने, संसाधनों की कमी को भी किक मारकर गोल कर रही हैं। यहां फुटबॉल के गुर सिखाकर कोच इंद्रजीत खिलाड़ियों के सपनों को पंख लगा रहे हैं।
कोच इंद्रजीत का मानना है कि खेल पहले दिमाग में जीता जाता है, मैदान बाद में आता है। उन्होंने बताया कि खिलाड़ियों के पास जूतों की कमी है लेकिन वे कदमों की रफ्तार से बाधाओं को पार करना जानती हैं। कोच ने बताया कि टीम ने पिछले साल दिल्ली में हुए 18 टीमों के स्कूल टूर्नामेंट में दो साल की चैंपियन को हराकर बाजी मारी थी। विशेष बात यह थी कि इस टूर्नामेंट में इन राजकीय स्कूलों की लड़कियों के सामने कई राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी थीं। उन्हें हराकर बच्चियों ने एक लाख रुपये की राशि जीती थी। जिसके बाद खिलाड़ियों ने अच्छे जूते लिए थे। इसके अलावा पिछले दो वर्षों से कई राज्य स्तरीय फुटबॉल टूर्नामेंट में दबदबा कायम किया है। पिछले वर्ष कुरुक्षेत्र में हुए टूर्नामेंट में फरीदाबाद से सभी लड़कियां इसी खेल नर्सरी की थीं। उन्होंने बताया कि अब तक कुल 20 से 25 खिलाड़ी राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर दम दिखा चुकी हैं।
जीत से मिला हौसला
हमारे पास महंगे जूते नहीं थे। कदमों में रफ्तार और जीत का जुनून था। बड़े स्कूलों को हराकर हमने साबित किया कि हौसला किसी संसाधन का मोहताज नहीं होता है।
- अंशिका, खिलाड़ी
इंद्रजीत सर ने सिखाया कि गरीबी कोई बहाना नहीं बल्कि एक चुनौती है। मैदान पर जब हम उतरते हैं, तो हमारा लक्ष्य सिर्फ गोल होता है। मैं अपने सपने साकार करने के लिए मेहनत कर रही हूं।- सौम्या, खिलाड़ी
दिल्ली में मिली जीत और एक लाख के इनाम को जीतकर अहसास हुआ कि हम कुछ भी कर सकते हैं। उन पैसों से खरीदे जूते अब हमें अंतरराष्ट्रीय मैदानों के सपने दिखा रहे हैं।-अर्पिता
हम सिर्फ फुटबॉल नहीं खेल रहे हैं, बल्कि अपने सपने को जी रहे हैं। सर के अधूरे सपने को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं। राज्य स्तर पर दबदबा बनाने के बाद अब देश के लिए खेलना है। -संजना