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Faridabad News: प्रणव सूरमा ने रजत पदक जीत किया शहरवासियों को गौरवांवित

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- गौरव का ये पैरालंपिक के क्लब थ्रो इवेंट में पहला पदक
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अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। औद्योगिक नगरी के दिव्यांग प्रणव सूरमा ने गौरवांवित होने का मौका दिया है। उन्होंने पेरिस पैरालंपिक में अपनी एफ-51 श्रेणी में क्लब थ्रो स्पर्धा में 34.58 थ्रो करके रजत पदक हासिल कर खेल जीवन के अपने सबसे बड़े सपनों में से पूरा कर दिखाया। उनका पहला पैरालंपिक पदक है। इसे पाकर वह काफी उत्साहित है।
ग्रीन फील्ड कॉलोनी निवासी प्रणव सूरमा यहां परिवार के साथ रहते हैं। इस समय उनका पूरा परिवार प्रणव का उत्साह बढ़ाने के लिए पेरिस गया हुआ है। प्रणव के पिता संजीव सूरमा ने बताया कि प्रणव ने ट्रायल में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाकर पैरालंपिक के लिए क्वाॅलिफाई किया था। जिससे उसका आत्मविश्वास और बढ़ गया है। इसके अलावा पेरिस में भी तैयारी का समय मिला था। उन्होंने कहा कि देश लौटने पर जोरदार स्वागत किया जाएगा।
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खिलाड़ी के सभी दिन एक जैसे नहीं, रजत पदक से काफी उत्साहित

प्रणव सूरमा ने बताया कि खिलाड़ी के सभी दिन एक जैसे नहीं होते हैं। बुधवार का धर्मबीर का दिन था। वह रजत पदक जीत कर काफी उत्साहित हैं। पैरालंपिक में पदक जीतने का उनका सपना था जो पूरा हुआ।
शारीरिक कमजोरियों को अपने विकास में न बनने दें बाधा
प्रणव ने सभी युवाओं से अपील है कि शारीरिक कमजोरियों को अपने विकास में बाधा नहीं बनने दें, बल्कि उसे चुनौती मानकर अपने लक्ष्य का पाने की दिशा में जी-जान लगाकर कड़ी मेहनत करें। सफलता हासिल करने में थोड़ा समय लगता है, लेकिन एक दिन सफलता जरूर मिलती है। उन्होंने बताया कि व्हीलचेयर उनके लिए वरदान साबित हुई है। दिव्यांग होने के बाद पूरे विश्व में प्रसिद्धि मिली है। इसका श्रेय पिता संजीव सूरमा और परिजनों को जाता है।
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प्रणव की उपलब्धियां

प्रणव ने इस वर्ष हांगझू पैरा एशियन गेम्स में स्वर्ण, सर्बिया ओपन चैंपियनशिप में स्वर्ण और ट्यूनिश ग्रैंड प्रिक्स में रजत पदक हासिल किया था।
चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना चाहते थे प्रणव
प्रणव पढ़-लिखकर चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना था, लेकिन 2011 में 16 वर्ष की उम्र में एक परिचित के घर का छज्जा उन के ऊपर गिर गया। इस घटना में प्रणव की रीढ़ की हड्डी पर चोट पहुंची और हाथ-पैर दोनों ने काम करना बंद कर दिया था। फिर माता-पिता दीपिका-संजीव सूरमा, दादा केवल कृष्ण, बहन भावनी व मित्रों की दुआओं ने असर दिखाया। प्रणव की हालत में सुधार हुआ और शरीर ने कुछ काम करना शुरू किया। स्थिति और बेहतर हुई तो जिंदगी को पटरी पर लाने के उद्देश्य से प्रणव ने सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा में बैठने का निश्चय किया। अपने उपनाम सूरमा के अनुरूप ही प्रणव ने खुद में सूरमाओं जैसा जज्बा दिखाया और 93.5 फीसदी अंकों के साथ प्रणव ने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। परिवार के सहयोग की वजह से वह न सिर्फ मानसिक दबाव से बाहर निकले, बल्कि विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई है।
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