माना की सारी औलाद एक जैसी नहीं होती, लेकिन वृद्धाश्रम में बढ़ती बुजुर्गों की संख्या आज के समाज की मानसिकता को दर्शा रही है। ताऊ देवीलाल वृद्धाश्रम में करीब 60 बुजुर्ग रह रहे हैं, ये सभी अपने बच्चों से तिरस्कृत हैं, मदर्स डे पर जब इनसे बातचीत की गई तो किसी की आंखों से आंसू बहे तो किसी ने खुद को अगले जन्म में बेऔलाद रहने की प्रार्थना की।
घर के बाहर छोड़कर बेटे और बहू ने दरवाजा बंद किया
50 वर्षीय बुजुर्ग अनीता ने बताया कि पति ओमप्रकाश का 15 वर्ष पहले निधन हो गया था। बेटी नेहा और बेटा दीपू की शादी कर दी, लेकिन बहू आते ही बेटा बदल गया। पैरेलाइज अनीता देवी से बहू रोज लड़ती थी, एक दिन मां को घर के बाहर छोड़कर बेटे और बहू ने दरवाजा बंद कर लिया। कई घंटे घर के बाहर बैठी रोती रही, लेकिन दरवाजा नहीं खोला। गली के एक व्यक्ति ने आश्रम का पता दिया। पिछले दो साल से अनीता यही रह रही हैं, आलम यह है कि अब औलाद नाम से नफरत हो गई है।
जबरदस्ती सड़क पर छोड़ दिया
77 वर्षीय सुमित्रा देवी ने आंखों में आंसू लेकर अपने दर्द को बयां किया। उन्होंने बताया कि बेटे ने पहले घर से निकाल दिया, फिर दो दिन बुजुर्ग पति-पत्नी सड़कों पर भटकते रहे, फिर बेटा घर ले गया। दो महीने बाद फिर जबरदस्ती सड़क पर छोड़ दिया। बेटे का नाम और नंबर अपने हाथ पर गुदवा लिया, बार-बार फोन करती रही लेकिन बेटा कभी नहीं आया। आश्रम में पति राजपाल की मृत्यु हो गई, इसके बाद भी उसका कलेजा नहीं पसीजा। अंतिम दिनों में राजपाल बेटे को देखना चाहते थे।
बीमार बेटे को देखने के लिए बिलख रहीं
80 वर्षीय बुजुर्ग भगवान देवी भी आश्रम में रह रही हैं, उनका बेटा बीमार है। बहू और पोतों ने आर्थिक स्थिति कमजोर होने का हवाला देकर आश्रम छोड़ दिया। सबसे ज्यादा याद वह अपने बेटे महेंद्र को करती हैं।
अकेले रहने के प्रचलन ने आश्रमों में बुजुर्गों की संख्या को बढ़ा दिया है। आज खुद के बच्चे निर्दयी हो गए हैं, बुढ़ापे का सहारा बनने की उम्र में बेसहारा कर छोड़ रहे हैं। आश्रम में 60 बुजुर्ग हैं, जिनकी देखभाल की जा रही है। सामाजिक संस्थाओं का भी आर्थिक सहयोग मिल जाता है। -किशन लाल बजाज, संस्थापक, ताऊ देवी लाल आश्रम