फरीदाबाद। मौसम में आ रहे बदलाव के साथ सूरजकुंड मेले का स्वरूप भी बदल रहा है। बीते छह दिनों तक वीरान रहे मेले का आंगन शुक्रवार को भरा नजर आया। गर्मी के बावजूद 50 हजार से अधिक सैलानी मेले का लुफ्त उठाने पहुंचे। भीड़ देखकर हस्तशिल्प कलाकारों के चेहरे भी खिले नजर आए। उनका कहना था कि बीते दिनों की अपेक्षा शुक्रवार को कारोबार काफी अच्छा रहा। छुट्टी होने के कारण शनिवार और रविवार को भी काफी संख्या में सैलानियों के पहुंचने की उम्मीद है।
सूरजकुंड मेले में रोजाना एक लाख से अधिक सैलानियों के पहुंचने की व्यवस्था है। मेला प्रबंधन को उम्मीद थी कि पिछले सालों की तरह इस साल भी मेला आरंभ के समय से ही सैलानियों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 19 से लेकर 25 अप्रैल के बीच सैलानियों की संख्या एक लाख से भी कम बताई जा रही है। अधिकारी इसका मुख्य कारण गर्मी के साथ स्कूलों में चल रहे परीक्षाओं को मान रहे हैं। हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि शुक्रवार को काफी संख्या में सैलानी मेले का लुफ्त उठाने पहुंचे। इनकी संख्या 50 हजार से अधिक थी। ऐसे में हस्तशिल्प कलाकार भी खुश नजर आए। कलाकारों ने बताया कि सैलानियों की संख्या बढ़ने से उनका कारोबार अन्य दिनों अपेक्षा अधिक रहा। मेला प्रबंधन के अनुसार, शनिवार और रविवार को मेले में सैलानियों की संख्या एक लाख से अधिक रहेगी। ऐसे में उन्हें कोई असुविधा न हो, इसकी तैयारियां पूरी हैं। इससे स्टॉल पर हस्तशिल्प कलाकारों को भी काफी फायदा होगा। साथ ही पर्यटन विभाग का भी राजस्व बढ़ेगा।
4 लाख की स्टोन डस्ट पेंटिंग बनी आकर्षण का केंद्र
मेले में एक से एक कलाकारी के नमूने देखने को मिल रहे हैं। इसी में एक है स्टोन डस्ट पेंटिंग। यह मेले में आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। मेला परिसर स्थित 1043 स्टॉल पर आए फरीदाबाद के दायालपुर निवासी हस्तशिल्प कलाकार निशा ने बताया कि 400 रुपये से चार लाख तक के स्टोन डस्ट पेंटिंग उपलब्ध हैं। चार लाख रुपये की पेंटिंग बनाने में करीब एक साल का वक्त लगा। इसकी लंबाई और चौड़ाई करीब आठ फीट है। मार्बल के घिसने के दौरान निकलने वाले डस्ट यानी धूल से यह पेंटिंग बनाई गई है। इस कला की शुरुआत 20 साल पहले की थी। सूरज को इस कला में साल 2010 में नेशनल अवार्ड भी मिल चुका है। निशा और सूरज ने बताया कि मूर्तिकारों के यहां से मार्बल के कटिंग का डस्ट खरीदकर लाते हैं। उसे अच्छे से पीसकर पूरी तरह से पतला कर देते हैं। बबूल का गोंद डालकर लकड़ी या अन्य प्लेट पर चित्रकारी करते हैं। फिर प्राकृतिक और ऑयल वाले रंग से रंगते हैं।
पुरानी साड़ी को जलाकर बनाते हैं जूलरी
मेले में स्टॉल नंबर 1001 पर मूलरूप से गुजरात निवासी हस्तशिल्प कलाकार करण सोलंकी, अनिता सोलंकी, चेतन कुमार आदि ने बताया कि वे मेले में गोटा चांदी की जूलरी लेकर आए हैं। पुरानी साड़ी जलाने के बाद निकलने वाली मेटल से इस जूलरी को बनाया गया है। जूलरी बनाने में कई दिन लगते हैं। साड़ी को जलाकर मेटल निकालते हैं, फिर मेटल को पिघलाकर चूड़ी, कड़ा, झुमके और चेन आदि बनाते हैं। देखने में बिल्कुल चांदी की तरह लगते हैं।
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