गुलामी की बेड़ियां तो टूटी थीं, लेकिन अपनी जमीन से उखड़ जाना भी हम जैसे बहुतों की नियति बन गई थी। बमुश्किल तीन महीने में जमना यहां भी नहीं हो सका था। जिंदगी में कुछ भी स्थायी नहीं था। अंधेरा हर तरफ घना था। दुखों के इसे मजबूत घेरे को पहली चोट दीपावली ने मारी थी। 12 नवंबर की सर्द शाम हमारे चेहरों पर महीनों बाद खुशी तैरी थी। जो कुछ भी था, उसी को जोड़कर आजाद भारत में दीपावली मनाई गई।
न्यू इंडस्ट्रियल एरिया (एनआईटी) में हर तरफ इसी तरह की ढेरों कहानियां पसरी हैं। बड़े-बुजुर्ग तफ्सील से इसकी तस्दीक करते हैं। मसलन, रामशरण तनेजा (82) बताते हैं कि अविभाजित भारत (अब पाकिस्तान) में महीने भर पहले से दीपावली की तैयारी करते थे। बच्चों में त्योहार का अपना जोश रहता, उमंग भी। आने वाले दंश से अनजान 1945-46 का साल भी पहले जैसा ही रहा था। लेकिन आजादी मिलते ही सब-कुछ बदल गया। भारत आने पर हमने पहले कुरुक्षेत्र और फरीदाबाद के अरावली इलाके में लगे टेंट को अपना आशियाना बनाया। पहली दीपावली यहीं मनी थी। लेकिन एक साल बाद फरीदाबाद में ही सामूहिक दीपावली मनाई। इसमें सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खां भी शामिल हुए थे। वहीं, मोहन लाल भाटिया कहते हैं कि अविभाजित भारत में (बन्नू जिला पाकिस्तान) में अच्छी खासी प्रॉपर्टी थी।
देश के विभाजन के बाद सब बदल गया। आलीशान मकानों में मनने वाली दीपावली हमने फरीदाबाद के छोटे से टेंट में मनाई। सब बड़ा चुनौतीपूर्ण था। टेंट के बाहर लकड़ी जलाकर रोशनी करनी पड़ी थी। हां, बीते करीब 75 सालों में हम त्रासदी से तकरीबन उबर गए हैं।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेतृत्व में एनआईटी बसा
बंटवारे के बाद पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के पेशावर, हजारा, मर्दाना, कोहाट, बन्नू और डेरा इस्माइल खान जिले के करीब 50 हजार लोग पहले कुरुक्षेत्र के शरणार्थी शिविरों में पहुंचे। तत्कालीन सरकार इनको राजस्थान के अलवर और भरतपुर में बसाना चाहती थी। जबकि लोगों की मंशा दिल्ली के नजदीक रहने की थी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इन सबको दिल्ली के नजदीक फरीदाबाद में बसाने का निर्णय लिया।
प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद फरीदाबाद विकास बोर्ड के चेयरमैन बने। वहीं, मुख्य प्रशासक सुधीर बोस थे। बोर्ड के सदस्य लेडी नाई, सालार सुखराम, सरदार गुरबचन सिंह को बनाया गया। एनआईटी का डिजायन जर्मन आर्किटेक्ट निस्सन ने तैयार किया था। टाउन नंबर-पांच, मौजूदा नगर निगम मुख्यालय, बीके अस्पताल में शरणार्थियों के लिए बनी हटों को अब निस्सन हट के नाम से जाना जाता है। शुरुआत में यहां 5,196 मकान बनाए गए थे।
एनआईटी की स्थापना के साथ इस शहर को औद्योगिक पहचान मिलनी शुरु हुई थी। सरकार ने शरणार्थियों के लिए बाटा शू, भारत सरकार मुद्राणालय कई अन्य उद्योग लगवाए। उसके बाद यह पूरा शहर औद्योगिक नगरी में तब्दील होकर देश का प्रमुख औद्योगिक शहर बन गया। वहीं शरणार्थी बनकर आए लोगों में से दर्जनों अब बड़े उद्यमी बन चुके हैं। उनमें से एक लखानी अरमान ग्रुप के मालिक केसी लखानी भी हैं।