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आर्गेनिक खेती अपनाएं...खुद के साथ दूसरों का जीवन बचाएं

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खेत मे काम करते धौज के किसान विनय कौशिक । - फोटो : Faridabad
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बल्लभगढ़। कोरोना के कारण पिछले 2 वर्षों में लोगों को यह तो सीख मिल गई कि हेल्दी फूड खाएंगे तो ही स्वस्थ रहेंगे। इसी को देखते हुए धौज निवासी विनय कौशिक ऑर्गेनिक और नेचुरल खेती करके किसानों को जागरूक कर रहे हैं। उनका कहना है कि आर्गेनिक खेती अपनाएं और खुद के साथ दूसरों का भी जीवन बचाएं। उन्होंने देशभर के करीब 300 किसानों को ऑर्गेनिक और नेचुरल खेती करने का तरीका सिखाया है और उसके लाभ भी बताए हैं।
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विनय कौशिक ने बताया कि वह पिछले 8 सालों से धौज में ही ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। इस ऑर्गेनिक खेती में वह सब्जी, फल और दालें आदि उगाते हैं। उन्होंने बताया कि पढ़ाई के दौरान उन्होंने सीखा कि हेल्दी फूड खाने से ही शरीर स्वस्थ रहता है। योग पर तो उनका ध्यान शुरू से ही था, लेकिन हेल्दी फूड को लेकर वह हमेशा चिंतित में रहते थे। क्योंकि, बाजार में मिलने वाला खाना कहीं न कहीं केमिकल से बना होता था। इसलिए उन्होंने ऑर्गेनिक खेती के बारे में पढ़ा तो उन्होंने इसको लेकर कई वर्कशॉप से ट्रेनिंग ली और उसके बाद अपने ही खेत में ऑर्गेनिक खेती करनी शुरू कर दी। उन्होंने सोचा कि इस ऑर्गेनिक खेती को अन्य किसानों को भी सिखाया जाए तो लोगों को भी स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इसके बाद उन्होंने किसानों को जोड़ना शुरू किया। अब तक वह जिले के करीब 15 किसानों को जोड़ चुके हैं और देशभर के 300 किसान उनके साथ कार्य कर रहे हैं। ऑर्गेनिक खेती की सब्जी सामान्य खेती की सब्जी से करीब 20 से 30 प्रतिशत ज्यादा महंगी होती है। क्योंकि, यह हेल्दी फूड होता है और आज के समय में लोग हेल्दी फूड को ज्यादा महत्व देते हैं। कोरोना काल ने लोगों को सिखा दिया है कि साफ और स्वच्छ खाना खाना चाहिए, जिसके बाद लोग ज्यादातर ऑर्गेनिक और नेचुरल सब्जी का सेवन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा उगाई जा रहीं सब्जियां व फल को वह गुरुग्राम और दिल्ली के बाजारों में बेचते हैं। गुरुग्राम में इसको लेकर एक अलग से बाजार लगता है जहां पर सिर्फ और सिर्फ ऑर्गेनिक चीजें ही मिलती हैं।
इन गांव में की जा रही है ऑर्गेनिक खेती
विनय कौशिक ने बताया कि धौज के अलावा गांव मंझावली, गांव सेलाखरि, गांव खुलाना, गांव टेकावली, सरूरपुर आदि जगह पर ऑर्गेनिक खेती की जा रही है। गर्मी ज्यादा होने की वजह से अभी कोई खेती नहीं की जा रही है। बरसात के दिनों में फिर खेती की जाएगी।
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मशीन और दवाइयों का नहीं होता है प्रयोग
विनय ने बताया कि नेचुरल खेती में मिट्टी की सतह पर ही रोगाणुओं और केचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों के अपघटन को प्रोत्साहित किया जाता है। इससे धीरे-धीरे मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि होती है। इसके अलावा मजदूरों द्वारा ही खेती में लग रहे ग्रास व अन्य को निकाला जाता है। इसमें लागत कम लगती है, लेकिन ज्यादा लोगों की जरूरत होती है। क्योंकि, सभी कार्य हाथों से किए जाते हैं। यहां तक कि खेत भी हल से जोता जाता है न कि ट्रैक्टर से।
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