किरण बेदी डॉट कॉम नाम की उनकी ही एक साइट पर किरण बेदी और पूर्व प्रधानमंत्री से जुड़ी ऐसी सच्चाई दी गई है जो किसी को भी चौंका सकती है।
किरण बेदी के बारे में यह माना जाता है कि वह बेहद निडर और ईमानदार पुलिस अफसर थीं। इसका उदाहरण देते हुए बताया जाता है कि पुलिस महकमे में रहते हुए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक की कार को नो पार्किंग जोन में पार्क करने पर उठवा लिया था। इस मामले की सच्चाई कुछ और ही है।
असल में यह घटना 5 अगस्त 1982 की है। एक सफेदर अंबेसडर कार कनॉट सर्कस जिसे अब कनॉट प्लेस के नाम से जाना जाता है, इलाके में पार्क की गई थी।
कार का नहीं दुकान का काटा गया चालान
इस कार का नंबर था DHD-187। इस इलाके में तैनात ट्रैफिक पुलिस इंस्पेक्टर ने पाया कि कार नो पार्किंग जोन में खड़ी है। असल में यह कार एक दुकान के बाहर खड़ी थी। ट्रैफिक इंस्पेक्टर ने तुरंत ही चालान काट दिया लेकिन यह चालान कार का नहीं बल्कि दुकान का काटा गया था।
चालान काटने वाले को बताया गया कि जिस कार के चलते वह चालान काट रहा है वह असल में प्रधानमंत्री के बेड़े की कार है। इसके बावजूद चालान वापस नहीं लिया गया।
इस पूरे मामले में चौंकाने वाले दो तथ्य हैं। पहला कि उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनका पूरा परिवार भारत में था ही नहीं। ड्राइवर कुछ सामान लेने अकेला ही मार्केट गया था।
घटना स्थल पर मौजूद नहीं थीं बेदी
इस पूरे मामले में एक चौंकाने वाला तथ्य जो किरण बेदी से जुड़ा हुआ है वह ये है कि इस पूरे मामले के दौरान किरण बेदी घटना स्थल पर मौजूद नहीं थीं। हालांकि बाद में इस पूरे मामले का श्रेय किरण बेदी ने खुद ले लिया।
इंदिरा गांधी के भारत वापस आते ही मामले की जांच की गई और पता चला कि जिस दुकान के बाहर खड़ी थी वह कार एक्सेसरीज की दिल्ली की नामी दुकान थी। वहां किसी भी कार में काम के दौरान कारें नो पार्किंग जोन में ही खड़ी की जाती थीं।
हालांकि जांच में पता चला कि असल गलती वीआईपी सिक्योरिटी और दिल्ली पुलिस के बीच तालमेल की कमी थी।
चोगम समिट के चलते भेजी गईं गोवा
प्रचार यह किया जाता है कि इस मामले के चलते ही किरण बेदी का ट्रांसफर दिल्ली से गोवा कर दिया गया था। कम ही लोग जानते हैं कि किरण बेदी को ट्रैफिक संभालने की जिम्मेदारी नवंबर-दिसंबर 1982 में एशियन गेम्स के दौरान दी गई थी। साथ ही गोवा में उनका ट्रांसफर उस घटना के सात महीने बाद मार्च 1983 में किया गया था।
माना ये भी जाता है कि गोवा में चोगम समिट होने वाला था जिसके लिए सबसे उपयुक्त अधिकारी उन्हें ही माना गया था इसलिए उन्हें गोवा भेजा गया।