चुनाव आयोग की सख्ती से इस बार होर्डिंग और बैनर का कारोबार लगभग ठप है।
हालांकि कारोबारी चुनाव प्रचार के गति पकड़ने का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन जिस उम्मीद से इन कारोबारियों ने कारिंदों से लेकर दूसरी व्यवस्थाएं की गई थी उसका लाभ नहीं मिल पाया है।
इस बार शहर की सड़कों से लेकर चौक-चौराहों, घरों की दीवार और सार्वजनिक स्थानों पर स्थानीय नेताओं के होर्डिंग नजर नहीं आ रहे हैं। इस महीने होली होने के बावजूद भी शहर से होर्डिंग-बैनर नदारद है।
इस साल के मुकाबले पिछले साल एक महीने पहले ही होली की शुभाकामनाओं के होर्डिंग बैनरो से शहर अट गया था। पिछले चुनावों में होर्डिंग और बैनर कारोबारियों ने खूब चांदी काटी थी।
यह भी पढ़ें: ICU से जनरल वार्ड में ट्रांसफर किया तो लगा ली फांसी
ये लोग स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले एक फिसदी काम भी नहीं हो पाया है। देव प्रिंटर के राजेश कुमार के अनुसार इस बार चुनाव के कारण होली पर भी धंधा करीब ठप रहा।
आचार सहिंता के डर और चुनाव आयोग सख्ती से राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की ओर से बैनर-होर्डिंग नहीं बनवाए गए। आचार संहिता के दौरान सार्वजनिक स्थानों पर प्रचार सामग्री चस्पा करने का नियम चूंकि प्रतिष्ठानों और दूसरे संगठनों पर भी लागू होता है। लिहाजा ऐसे लोगों ने इस बार इससे परहेज ही किया है।
यह भी पढ़ें: मकान मालिक से तंग आकर मेट्रो के आगे कूदा!
अन्यथा होली पर ही अच्छा खासा काम हो जाता था। उन्होंने बताया कि स्थानीय नेता अपने उम्मीवार के लिए शहर में ही होर्डिंग बैनर बनवाते हैं। काम बढ़ता देख पांच कारिंदें नए लगाए थे। उनका भी कोई फायदा नहीं हो पाया।
दूसरी ओर फ्लैक्स कारोबारी मुकेश कुमार ने बताया कि शहर में होर्डिंग-पोस्टर, बैनर और फ्लैक्स का कारोबार 50 लाख रुपये के पार चला जाता है, लेकिन इस बार अभी तक यह आंकड़ा दो लाख भी नहीं पहुंच पाया है। नेताओं पर चुनाव आयोग की सख्ती का सीधा असर दिख रहा है। हालांकि इस असर से उनका काम खासा प्रभावित हो रहा है।