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आठ साल की मासूम माही के दिल को चाहिए शरीर

Tue, 06 Aug 2019 06:17 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
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यही है माही... - फोटो : अमर उजाला
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अंगदान की भारी कमी के बीच सोमवार को दिल्ली की एक आठ साल की ब्रेन डेड मासूम का दिल धड़कने को बेताब है, लेकिन 6 घंटे तक इसके दिल को कोई शरीर नहीं मिला। स्थिति यह रही कि परिवार बच्ची को किसी और के रूप में जीवित देखने की इच्छा रखता है। 

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दिल्ली के सरकारी से लेकर निजी अस्पताल तक में शरीर नहीं मिलने से देर रात तक निराशा ही हाथ लगी। इस बीच सरकारी सिस्टम की बड़ी खामियां भी सामने आईं, जिस संदेश को सभी अस्पतालों में भेजा गया, उसमें लिखा फोन नंबर लगातार बंद था। 

यही नहीं, दो घंटे तक अस्पतालों को ये भी नहीं पता था कि बच्ची का ब्लड ग्रुप क्या है? उसकी ऊंचाई कितनी हैं? रात 11 बजे तक बच्ची के परिजनों के अनुसार किसी भी अस्पताल से जबाव नहीं मिला है। 
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दिल्ली के नजफगढ़ इलाका निवासी प्रवीण धनखड़ की बेटी 8 वर्षीय मासूम माही सेरेबल एडिमा से पीड़ित है। वह द्वारका सेक्टर 3 स्थित आकाश अस्पताल में उपचाराधीन थी, लेकिन सोमवार को ब्रेन डेड होने के कारण बच्ची के जीवन से जुड़ी परिवार की आश टूट गई। 

माता पिता ने बच्ची के अंगदान करने का फैसला डॉक्टरों को सुनाया तो दोपहर 2 बजे डॉक्टरों ने परिवार की काउंसलिंग की। इसके बाद शाम 5 बजे अस्पताल से राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (नोटो) की हेल्पलाइन पर नंबर पहुंचा। 

नोटो की ओर से सभी अस्पतालों को लेकर बनाए गए वॉट्सएप ग्रुप पर ये मैसेज डाला गया। इसके बाद गुडग़ांव के मेदांता, दिल्ली के अपोलो, बीएलके, फोर्टिस और एम्स तक से डिकलाइन (इंकार) आया। इसके बाद शाम 7 बजे तक ग्रुप पर नोटो की ओर से बच्ची के ब्लड ग्रुप इत्यादि से जुड़ी कोई जानकारी साझा नहीं की गई थी। 

मैसेज में जिस व्यक्ति का फोन नंबर दिया था, वह लगातार बंद आ रहा था। शाम 7 बजे के आसपास नोटो ने माही की उम्र, ऊंचाई और ओ नेगेटिव ब्लड ग्रुप होने की जानकारी दी। हालांकि देर रात तक नोटो की ओर से किसी भी अस्पताल से दिल लेने का मैसेज नहीं मिला। 

दो सप्ताह पहले हुआ था हेपेटाइटिस 

परिजनों के अनुसार, माही को दो सप्ताह पहले ही हेपेटाइटिस की शिकायत हुई थी। उसे एक अस्पताल ले गए, लेकिन सुधार न होने पर उसे आकाश अस्पताल लेकर आए। यहां बच्ची को कई तरह की समस्याएं सामने आईं। हेपेटाइटिस ए होने के कारण भी उसकी तबियत और खराब होती गई। इसके बाद सोमवार को डॉक्टरों ने माही को ब्रेन डेड घोषित कर दिया। 

अस्पतालों को भेजे हैं मैसेज
नोटो की निदेशक डॉ. वसंती का कहना है कि बच्ची के बारे में सूचना मिलने के बाद उसे सभी अस्पतालों में भेज दिया है। इस प्रक्रिया में कई बार समय लग जाता है। जब तक अस्पताल की ओर से मैसेज नहीं आएगा, अंगदान को लेकर आगे की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती। 

 
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आधी-अधूरी जानकारी अक्सर आती है ग्रुप पर

दिल्ली के एक निजी अस्पताल में प्रत्यारोपण की जिम्मेदारी संभाल रहे वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि इस तरह की परेशानी अक्सर देखने को मिलती है। कई बार मरीज का परिवार इंतजार में रहता है और मैसेज देश भर में पहुंचने में देरी होती है। उन्होंने एक केस का हवाला देते हुए यहां तक कहा कि कई महीने पहले एक अंगदान के लिए 12 घंटे तक इंतजार करना पड़ा। ये केस दिल्ली एम्स में था। 

ब्लड प्रेशर पर ध्यान देना जरूरी
एम्स के वरिष्ठ डॉ. एके विशोई बताते हैं कि ब्रेन डेड होने के बाद भी दिल को सुरक्षित रखा जा सकता है। हालांकि इसके लिए जरूरी है कि बच्ची का ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहे। इसके लिए ईसीएमओ मशीन का सहारा भी लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये गर्व की बात है कि परिवार इस मुश्किल घड़ी में भी अंगदान के लिए आगे आया। देश को ऐसे ही परिवारों की जरूरत है। 

स्कूल में टॉपर माही, सबका जीत लेती थी दिल
दादा बलराज बताते हैं कि माही नजफगढ़ के एक स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ती थी। उसकी मां सुमन वल्लभगढ़ के कॉलेज में शिक्षिका है। पिता प्रवीण प्रॉपर्टी डीलर हैं। माही का बचपन से ही सबको दिल जीत लेने का व्यवहार था। वह स्कूल में भी टॉपर रहती और कुछ ही पल में अपना दोस्त बना लेती थी। पूरे परिवार उसके जाने से सदमे में है। अब बस परिवार की ईच्छा है कि उसका दिल और आंखें किसी जरूरतमंद को मिल जाएं। 
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