तीनों नगर निगम के कर्मचारियों की हड़ताल लंबी चलने पर रिक्त पड़े 13 वार्डों के उपचुनाव कराने में अड़ंगा लग सकता है। दिल्ली राज्य चुनाव आयोग कर्मचारियों की हड़ताल के बीच चुनाव नहीं कराएगा।
आयोग का कहना है कि हड़ताल के कारण चुनाव प्रक्रिया और मतदान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। दिल्ली सरकार व तीनों नगर निगम के बीच चल रहे टकराव और तीनों नगर निगम की माली हालत के मद्देनजर कर्मचारियों को बहुत जल्दी राहत मिलती दिखाई नहीं दे रही।
दिल्ली राज्य चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि हाईकोर्ट ने भले ही तीन माह के अंदर 13 वार्डों के उपचुनाव कराने के निर्देश दे दिए है लेकिन आयोग के लिए चुनाव कराना आसान नहीं है।
उनका कहना है कि उपचुनाव कराने में कई दिक्कत उनके समक्ष है। एक ओर उनको दिल्ली सरकार से चुनाव के लिए बजट और कर्मचारी चाहिए, वहीं शहर में शांति का वातावरण उपलब्ध होना चाहिए।
चुनाव कराने में होगी परेशानी
उनका कहना है कि तीनों नगर निगम के कर्मचारियों की हड़ताल के चलते दिल्ली में शांति का माहौल नहीं है। ऐसे में चुनाव कराने का जोखिम नहीं लिया जा सकता। क्योंकि वेतन नहीं मिलने की स्थिति में वह चुनाव ड्यूटी नहीं करेंगे।
इसके अलावा उनके कर्मचारी स्थानीय चुनाव कार्यालर्यों में धरना-प्रदर्शन करके कामकाज ठप्प कर सकते है। वहीं वह मतदान केंद्रों के समक्ष कूड़ा भी डाल सकते है। वहां पर कूड़ा डालने की स्थिति में मतदाताओं की मतदान केंद्रों से दूरी बनाने की संभावना रहेगी।
उधर, दिल्ली सरकार और तीनों नगर निगम के बीच चल रहे टकराव और उनके खजाने में अन्य किसी जगह से राशि नहीं मिलने की संभावना के चलते कर्मचारियों की अभी खाली जेब ही रहने की संभावना है।
क्योंकि तीनों नगर निगम से दिल्ली सरकार हिसाब मांग रही है, वहीं नगर निगम के नेता हिसाब देने के बजाए दिल्ली सरकार पर आरोप लगाने में लगे हुए है।
नहीं रुक रहे नेताओं के बिलों के भुगतान
दूसरी ओर 31 मार्च तक तीनों नगर निगम के खजाने में मोटी धनराशि आने की कोई संभावना नहीं है। उनको प्रॉपर्टी टैक्स के माध्यम से बड़ी राशि मिलती है।
वर्तमान साल का लोग प्रॉपर्टी टैक्स दे चुके है और नए साल का टैक्स एक अप्रैल के बाद देने की शुरूआत करेंगे। आम तौर पर लोग जून माह में टैक्स जमा कराते है, क्योंकि 30 जून तक टैक्स जमा कराने में छूट मिलती है।
उत्तरी दिल्ली नगर निगम आर्थिक तंगी के बीच दोहरा मापदंड अपना रही है। उसके खजाने में कर्मचारियों को वेतन देने के लिए एक रुपया भी नहीं है।
पार्षदों के पास हो रहे सारे बिल
वहीं महापौर व अन्य महत्वपूर्ण पदों पर बैठे पार्षदों और समस्त समितियों के अध्यक्ष के कार्यालयों के चाय-पानी का बिल देने के लिए उसके खजाने में कोई कमी नहीं है।
निगम सचिव कार्यालय के अनुसार इन पार्षदों के कार्यालयों के चाय-पानी के बिल का निरंतर भुगतान किया जा रहा है। उनका एक माह का भी बिल बकाया नहीं है।
खास बात यह है कि नगर निगम की आर्थिक हालत खराब होने के बाद भी महत्वपूर्ण पदों पर बैठे पार्षदों के कार्यालय से प्रतिमाह बिल का भुगतान करने के लिए कार्रवाई की जा रही है। उनका प्रतिमाह करीब दो लाख रुपये बिल होता है।