डॉ. भूषण के अनुसार प्राइवेट अस्पतालों का कहना है कि जब मरीज अस्पताल में भर्ती होता है तो उसकी हालत काफी क्रिटिकल होती है। इस दौरान उसका आईसीयू, ऑपरेशन, महंगी दवाओं से इलाज किया जाता है। इसके बावजूद यदि मरीज की मौत हो जाती है और हम उसका 50 प्रतिशत बिल माफ कर देते हैं तो अस्पताल का खर्चा कहां से निकलेगा। शुरुआत के 6 घंटों में ही मरीज पर सबसे ज्यादा खर्चा होता है, ऐसे में हम बिल माफ करने में सक्षम नहीं हैं।
स्वास्थ्य मंत्री ने ड्राफ्ट में हाई रिस्क पैकेज को भी शामिल किया था। इस पैकेज के तहत यदि किसी मरीज के इलाज का पैकेज एक लाख रुपये है, लेकिन बाद में पता चलता है कि उसे पैकेज से बाहर इलाज की जरूरत है, जिसका खर्चा पहले पैकेज के बराबर या फिर उससे ज्यादा है तो इस स्थिति में अस्पताल मरीज से पहले पैकेज का केवल 20 या 30 प्रतिशत ही लेंगे और उसी में मरीज का पूरा इलाज करेंगे। इस पर भी प्राइवेट अस्पतालों ने असहमति जताते हुए अपनाने से इंकार कर दिया।
डॉ. कीर्ति भूषण का कहना है कि इसके पीछे प्राइवेट अस्पतालों ने यह तर्क दिया था कि शुरुआत में यह नहीं कहा जा सकता कि मरीज को किस पैकेज की जरूरत है। यदि कोशिश के बाद यह पता चल भी जाता है कि मरीज का इलाज एक लाख के पैकेज में हो जाएगा, लेकिन बाद में यदि स्थिति बिगड़ने पर दो लाख के पैकेज की जरूरत पड़ती है तो केवल 20 से 30 प्रतिशत और रुपये लेने से इलाज संभव नहीं हो सकता क्योंकि दवाओं पर ही बहुत पैसा खर्च हो जाता है।