सूत्र बताते हैं कि टिकट बंटवारे को लेकर सबसे ज्यादा विद्रोह की स्थिति एक पार्टी में उपजी। आरोप लगे कि ताकतवर उम्मीदवारों को किनारे कर दिया गया और कमजोर प्रत्याशी उतार दिया।
अभी तक सब कुछ सामान्य नहीं हो सका है। रूठे लोग चुप तो हुए लेकिन मन से काम नहीं कर रहे। कार्यकर्ता भूखे रह रहे हैं। दबी जुबान से वह कहते फिर रहे हैं कि जब ऐसा ही था तो टिकट ही नहीं लेना चाहिए था।
एक पार्टी की हकीकत तो बिल्कुल ही अलग है। जिसको टिकट मिलने का भी अंदाजा नहीं थे, पार्टी ने उन्हें जबरन मैदान में उतार दिया। वह उसी मन से प्रचार के लिए चल पड़ते हैं और राय मशविरा भी नहीं करते।
कई साथी ऐसे हैं, जो दूसरी पार्टी को वोट देने की तैयारी कर रहे हैं। प्रत्याशी ने तसल्ली कर ली कि जितने वोट मिल जाएंगे, उतना ही ठीक। अब दोबारा चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलने वाला।