देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली युवा लड़की का सपना क्यया होगा? अगर राजनीति में जाना उनका सपना हो तो जरूर ही वह देश या प्रदेश की राजनीति में अपना हाथ आजमाना चाहेंगी लेकिन, हम जिस युवा छात्रा की बात करने जा रहे हैं वह कुछ अलग ही सोच रखती हैं।
असल में डीयू के गार्गी कॉलेज में बीए मनोविज्ञान के अंतिम वर्ष की छात्रा वसुंधरा चौधरी ने कुछ अलग ही करने की सोची और उसे कर दिखाया। वसुंधरा राजस्थान के एक छोटे से गांव लीलावली की सरपंच चुनी गई हैं।
वसुंधरा गार्गी कॉलेज में सीखी हुई बातों की मदद से गांव की महिलाओं की सोच बदलने का काम करना चाहती हैं। कॉलेज में लोगों से बहुत कम बातें करने वाली वसुंधरा बताती हैं कि कॉलेज में हर छात्र कॉलेज प्रेसीडेंट, स्टूडेंट मैगजीन का संपादक या किसी क्रिएटिव सोसाइटी का हेड बनना चाहता है लेकिन उनका सपना कुछ और ही है।
इंटरनेट स्कूल में हुई प्रारंभिक शिक्षा
कुछ अलग बनने की चाहत रखने वाली वसुंधरा को दिसंबर में पता चला कि उनके गांव लीलावली में सरपंच के पद का चुनाव होने वाला है। उन्होंने इस पद के लिए मैदान में उतरने का फैसला किया। 21 साल की वसुंधरा खुशकिस्मत थीं कि उनके खिलाफ कोई चुनाव नहीं लड़ रहा था इसलिए वह निर्विरोध चुनाव जीत गईं।
वसुंधरा बताती हैं कि उनका गांव राजस्थान के गंगानगर में है। गंगानगर के हनुमान गढ़ जिले में ही लीलावली गांव है। वसुंधरा ने अपने जीवन के शुरूआती पांच साल गांव में बिताए फिर अपनी मां के साथ दिल्ली आ गई थीं।
राय इंटरनेशनल स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा करने वाली वसुंधरा साल में कम से कम चार महीने अपने गांव में दादी और पिता के साथ गुजारती हैं।
वसुंधरा बताती हैं कि उन्हें दिल्ली में बहुत कुछ सीखने को मिला है और सरपंच के रूप में अपने इन अनुभवों का इस्तेमाल अपने गांव में करना चाहती हैं। कॉलेज की पढ़ाई ने उन्हें खुद पर विश्वास करना सिखाया है।
विधवा विवाह है सबसे बड़ी चुनौती
वसुंधरा कहती हैं कि उनके गांव में अच्छी बात ये है कि यहां के अधिकतर बच्चे स्कूल जाते हैं। लेकिन गांव में महिलओं की स्थिती अच्छी नहीं है।
अधिकतर महिलाएं गृहणी हैं जिन्होंने केवल सातवीं या आठवीं तक पढ़ाई की है। इससे भी दुखद है कि अधिकतर महिलाओं की शादी 16 या उससे कम की उम्र में हो गई थी।
गांव की यही समस्याएं उन्हें चुनौती देती हैं और महिलाओं की हालत में सुधार के लिए काम करने की प्रेरणा भी देती है। लेकिन जिस काम को वह अपने सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखती हैं वह विधवा विवाह है।
बाल कटवाकर जाएंगी गांव
वसुंधरा बताती हैं कि इस बारे में बात करना तो दूर गांव में कोई यह सुनना भी पसंद नहीं करता। वह गांव की महिलाओं की मदद करना चाहती हैं ताकि लंबे समय से चली आ रही कुरीतियों के चंगुल से उन्हें बाहर निकाला जा सके।
वसुंधरा ने इसके लिए एक ऐसी योजना बनाई है जो पूरे गांव को चौंका सकती है। वसुंधरा ने तय किया है कि वो अपने बाल कटवाएंगी। वो जानती हैं कि छोटे बालों वाली सरपंच को लोग बिल्कुल भी पसंद नहीं करेंगे लेकिन लोगों की इसी सोच को वह बदलना चाहती हैं।
गांव की महिलाओं को वह समझाना चाहती हैं कि औरत वह सब कुछ कर सकती है जिसे वह करना चाहे। औरत केवल शादी करने और बच्चे पैदा कर घर में रहने के लिए पैदा नहीं हुई है।
सरपंच बनने के बाद उनकी जिंदगी में कुछ बदलाव भी आए हैं। वह बताती हैं कि सरपंच बनने के बाद कॉलेज में लोग उन्हें अलग तरीके से ट्रीट करते हैं।
अब ज्यादा लोग उन्हें पहचानते हैं
वसुंधरा बताती हैं कि अब ज्यादा लोग मुझे जानने लगे हैं। सभी टीचर खुश हैं और छात्र मुझे नोटिस करने लगे हैं। वो बताती हैं कि कॉलेज में छात्रों को लगता है कि गांव के सरपंच होने का मतलब खाप पंचायत का हिस्सा होना है।
वह कॉलेज में पढ़ने वाले अपने सहपाठियों को बताती हैं कि सरपंच और खाप में किसी तरह का कोई मेल नहीं है और वह खाप का हिस्सा नहीं हैं।
वसुंधरा कहती हैं कि वह कभी छात्र राजनीति में नहीं जाना चाहती थीं। सरपंच होने को वह इससे बहुत अलग मानती हैं। आगे की योजना के बारे में वसुंधरा ने बताया कि वह कॉलेज खत्म करके गांव नहीं जाएंगी क्योंकि उन्हें अभी आगे बहुत पढ़ना है। हालांकि वह हर महीने में 15 दिन गांव में ही रहेंगी।