उच्च न्यायालय ने मंगलवार को अनधिकृत निर्माणों के लिए मूकदर्शक बने रहने के लिए अधिकारियों की कड़ी खिंचाई की। अदालत ने कहा अगर सड़क के बीच में एक अवैध संरचना आती है तो एक सभ्य समाज कैसे बचेगा।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा रिकॉर्ड पर रखी गई तस्वीरें, जिन्होंने दो मजारों (धार्मिक संरचनाओं) के निर्माण के खिलाफ याचिका दायर की है। इनमें एक हसनपुर डीटीसी डिपो के सामने स्वामी दयानंद मार्ग रोड पर और दूसरी भजनपुरा के वजीराबाद रोड पर यह दावा करते हुए कि वे अवैध हैं यह एक चौंकाने वाली स्थिति का खुलासा करता है।
पीठ ने कहा कि अधिकारियों को ऐसे मामलों पर स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाना चाहिए और अतिक्रमणकारियों को कड़ा संदेश देना चाहिए कि इस तरह के अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और इस तरह के अवैध निर्माण करने वालों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।
पीठ ने कहा हम यह समझने में असमर्थ हैं कि सरकार कैसे मूक दर्शक बन सकती है और इस तरह की अवैधताओं को होने दे सकती है। हमारे विचार से राज्य को ऐसे मामलों में स्पष्ट, निश्चित और दृढ़ रुख अपनाना चाहिए। सभी अतिक्रमणकारियों को स्पष्ट संदेश भेजने के लिए कड़ी कार्रवाई की जाए कि इस तरह के अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे और जैसे ही वे होंगे उन्हें हटा दिया जाएगा। पीठ ने कहा कि इस तरह के अवैध ढांचे को खड़ा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए और उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
दिल्ली सरकार से मांगी स्टेटस रिपोर्ट
अदालत ने दिल्ली सरकार के वकील को मामले पर एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने का भी निर्देश देते हुए मामले की सुनवाई 16 नवंबर तय की है।
पीठ ने याची द्वारा पेश तस्वीरों को देखने के बाद दिल्ली सरकार के वकील से कहा आप तस्वीरों को देखिए इसकी इजाजत कैसे दी जाए? सड़क के बीच में कोई ढांचा आ जाएगा तो सभ्य समाज कैसे बचेगा।
अदालत अधिवक्ता एसडी विंडलेश द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि अतिक्रमण यातायात में बाधा डाल रहे हैं और नागरिकों को कठिनाई हो रही है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए।