उन्होंने निजी स्कूलों द्वारा शपथपत्र का हवाला देते हुए कहा कि स्कूलों ने स्वयं माना है कि ट्यूशन फीस का 60 प्रतिशत राशि वेतन के प्रति अपनी देनदारियों का निर्वहन करने के लिए पर्याप्त था और शेष राशि अन्य खर्च मदो के लिए है। दिल्ली सरकार ने चुनौती याचिका में कहा कि पिछले साल अप्रैल और अगस्त के उसने आदेश व्यापक जनहित में जारी किए गए थे क्योंकि लॉकडाउन के कारण लोग वित्तीय संकट में थे।
वहीं छात्रों ने अपनी अपील में कहा कि जब स्कूल ही बंद है तो स्कूल बंद होने पर भवनों की मरम्मत, प्रशासनिक खर्च, किराया और हॉस्टल खर्च लागू नहीं होते। उन्होंने तर्क दिया कि वार्षिक और विकास शुल्क को मात्र स्थगित किया गया था और लेने से रोका नहीं गया थघा। महामारी की स्थिति सामान्य होने के बाद स्कूल इस मद में शुल्क ले सकते है।
सिंगल जज का आर्डर
न्यायमूर्ति जयंत नाथ ने अपने 31 मई के फैसले में गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों को बच्चों से वार्षिक शुल्क और विकास शुल्क लेने की अनुमति प्रदान कर दी थी। अदालत ने दिल्ली सरकार द्वारा 18 अप्रैल 20 व 28 अगस्त 20 को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसमें कोरोना महामारी के दौरान स्कूलों द्वारा वार्षिक शुल्क और विकास शुल्क लेने को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया था। अदालत ने कहा कि स्कूल बंद रहे या खुले स्कूलों को कुछ मदो में खर्च करना ही पड़ता है।
अदालत ने कहा था कि डीओई के पास निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की फीस स्ट्रक्चर में हस्तक्षेप करने का तब तक कोई अधिकार नहीं जब तक यह साबित न हो जाए कि वह मुनाफाखोरी कर रहे हैं।