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झटका: छात्रों को भरना होगा वार्षिक व विकास शुल्क, पूर्व आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

Mon, 07 Jun 2021 02:29 PM IST
पूजा त्रिपाठी अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

दिल्ली उच्च न्यायालय ने निजी स्कूलों को लॉकडाउन खत्म होने के बाद की अवधि के लिए छात्रों से वार्षिक और विकास शुल्क लेने की अनुमति देने वाले आदेश पर रोक लगाने से इनकार किया है।
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delhi high court - फोटो : PTI
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विस्तार
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हाईकोर्ट ने गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों को वार्षिक व विकास शुल्क वसूलने के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। अदालत ने इस मामले में फिलहाल निजी स्कूलों की एक्शन कमेटी को नोटिस जारी कर दायर याचिका पर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। दिल्ली सरकार व कई अन्य छात्रों ने सिंगल के फैसले को दो सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी है। सरकार व छात्रों ने तर्क रखा है कि हाईकोर्ट के सिंगल जज का फैसला कानून के खिलाफ व अधूरे तथ्यों पर आधारित है। याचिका पर सोमवार को सुनवाई संभव है।

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न्यायमूर्ति रेखा पल्ली व न्यायमूर्ति अमित बंसल की अवकाशकालीन खंडपीठ ने सिंगल जज के फैसले पर रोक लगाने से इंकार करते हुए कहा कि इस याचिका पर 10 जुलाई को नियमित खंडपीठ सुनवाई करेगी। अदालत ने करीब 450 निजी स्कूलों की एक्शन कमेटी को नोटिस जारी कर स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्यों न याचिका स्वीकार कर ली जाए।

सुनवाई के दौराना हालांकि, निजी स्कूलों ने याचिका पर आपत्ति जताई, लेकिन साथ ही अदालत को आश्वासन दिया कि सुनवाई की अगली तारीख तक वे छात्रों से फीस वसूलने के मामलों में मौजूदा सिद्धांतों का पालन करते रहेंगे। खंडपीठ के फैसले पर रोक लगाने से इंकार करने पर दिल्ली सरकार की और से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने पक्ष रखना शुरु किया तो अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकलुभावन सरकार मत बनो, स्कूलों को भी पैसा दें।
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विकास सिंह ने कहा कि सिंगल ने जज स्कूल की फीस वसूली पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की व्याख्या का निष्कर्ष पर पहुंचने पर गंभीर रूप से गलती की। उन्होंने इस फैसले में इस तथ्य की अनदेखी की गई है कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय राजस्थान राज्य से संबंधित है और ट्यूशन फीस लगाना उस समय के लिए था जब स्कूल वहां फिजीकल रूप से फिर से खुल गए थे।
 

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उन्होंने निजी स्कूलों द्वारा शपथपत्र का हवाला देते हुए कहा कि स्कूलों ने स्वयं माना है कि ट्यूशन फीस का 60 प्रतिशत राशि वेतन के प्रति अपनी देनदारियों का निर्वहन करने के लिए पर्याप्त था और शेष राशि अन्य खर्च मदो के लिए है। दिल्ली सरकार ने चुनौती याचिका में कहा कि पिछले साल अप्रैल और अगस्त के उसने आदेश व्यापक जनहित में जारी किए गए थे क्योंकि लॉकडाउन के कारण लोग वित्तीय संकट में थे।

वहीं छात्रों ने अपनी अपील में कहा कि जब स्कूल ही बंद है तो स्कूल बंद होने पर भवनों की मरम्मत, प्रशासनिक खर्च, किराया और हॉस्टल खर्च लागू नहीं होते। उन्होंने तर्क दिया कि वार्षिक और विकास शुल्क को मात्र स्थगित किया गया था और लेने से रोका नहीं गया थघा। महामारी की स्थिति सामान्य होने के बाद स्कूल इस मद में शुल्क ले सकते है।

सिंगल जज का आर्डर
न्यायमूर्ति जयंत नाथ ने अपने 31 मई के फैसले में गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों को बच्चों से वार्षिक शुल्क और विकास शुल्क लेने की अनुमति प्रदान कर दी थी। अदालत ने दिल्ली सरकार द्वारा 18 अप्रैल 20 व 28 अगस्त 20 को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसमें कोरोना महामारी के दौरान स्कूलों द्वारा वार्षिक शुल्क और विकास शुल्क लेने को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया था। अदालत ने कहा कि स्कूल बंद रहे या खुले स्कूलों को कुछ मदो में खर्च करना ही पड़ता है।

अदालत ने कहा था कि डीओई के पास निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की फीस स्ट्रक्चर में हस्तक्षेप करने का तब तक कोई अधिकार नहीं जब तक यह साबित न हो जाए कि वह मुनाफाखोरी कर रहे हैं। 
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