अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक 11 वर्षीय बेघर बालक के साथ अप्राकृतिक यौन शोषण के आरोप में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अपील खारिज करते हुए उसकी सजा को बरकरार रखा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सड़क पर जीवन यापन करने वाले बच्चे से तिथि, समय या कपड़ों जैसे विवरणों की वही सटीकता की अपेक्षा नहीं की जा सकती, जो एक सुव्यवस्थित वातावरण में रहने वाले गवाह से की जाती है।
न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने 10 अगस्त को दिए गए निर्णय में ट्रायल कोर्ट के अगस्त 2025 के फैसले को यथावत रखा। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 (गंभीर पेनिट्रेटिव यौन हमले के लिए सजा) के तहत दोषी करार दिया था। हालांकि, न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 20 वर्ष की सजा को घटाकर 10 वर्ष कर दिया। न्यायालय ने कहा कि अपराध के समय संबंधित प्रावधान के तहत अधिकतम सजा 10 वर्ष ही निर्धारित थी, इसलिए सजा को उसी के अनुरूप संशोधित किया गया।
न्यायालय ने पीड़ित बालक के बयान को विश्वसनीय माना और आरोपी की इस दलील को खारिज कर दिया कि बयान में कुछ विवरणों की कमी के कारण दोषसिद्धि संदिग्ध हो जाती है। इस फैसले में सड़क पर रहने वाले बच्चों की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उनके साक्ष्य के मूल्यांकन पर जोर दिया गया है।