क्या कहते हैं आंकड़े
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी (DPCC) के एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2017-18 से 2020-21 के बीच पांच वर्षों में यमुना की सफाई में जुटे विभिन्न विभागों को 6856.9 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई थी। यह धनराशि यमुना में गिरने वाले गंदे पानी के शोधन के लिए दिया गया था। 2015 से 2023 की पहली छमाही तक केंद्र सरकार ने यमुना की सफाई के लिए दिल्ली जल बोर्ड को लगभग 1200 करोड़ रुपये दिए थे। इसमें नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के अंतर्गत 1000 करोड़ रुपये और यमुना एक्शन प्लान-3 के अंतर्गत 200 करोड़ रुपये दिए गए थे।
केजरीवाल सरकार ने किया खर्च
आम आदमी पार्टी ने 2015 में दिल्ली की सत्ता में आने के बाद से 700 करोड़ रुपये यमुना की साफ-सफाई पर खर्च किया है। जल शक्ति मंत्रालय ने एक बयान जारी कर दावा किया था कि उसने 11 प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए अरविंद केजरीवाल सरकार को 2361.08 करोड़ रुपये दिया था। इसका उपयोग यमुना में गिरने वाले गंदे जल को शोधित करने के लिए एसटीपी का निर्माण करना था। इस धन का कितना उपयोग हुआ, यमुना का गंदा पानी बता रहा है।
नमामि गंगे योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार ने 4290 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत किया था। इस धनराशि से यमुना में गिरने वाले गंदे जल को ट्रीट कर शुद्ध करने के लिए 23 प्रोजेक्ट पर काम किया जाना था। इसकी कुल क्षमता 1840 एमएलडी थी। इसमें 12 प्रोजेक्ट राजधानी दिल्ली में थे, जबकि हिमाचल प्रदेश में एक, हरियाणा में दो और उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर आठ एसटीपी बनाए जाने थे।
नागरिक बोध की कमी
यमुना की गंदगी के लिए सबसे बड़ा कारण नागरिकों में अपने कर्तव्य बोध की कमी है। वे पूजा करने के बाद फल-फूल की गंदगी यमुना में गिराने को किसी तरह गलत नहीं समझते। पढ़े-लिखे लोग भी आस्था के नाम पर यमुना को गंदा करते हैं और ऐसा करने में वे कुछ गलत नहीं समझते। नागरिकों में इस सोच की कमी के कारण यमुना की साफ-सफाई सरकारों की प्राथमिकता में भी नहीं आता। यही कारण है कि यमुना कभी साफ नहीं हो पाती।