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Delhi: महिला पहलवानों से यौन उत्पीड़न के मामले में सुनवाई पूरी, कोर्ट ने 18 अप्रैल तक फैसला रखा सुरक्षित

Thu, 04 Apr 2024 03:45 PM IST
आकाश दुबे एजेंसी, दिल्ली

सार

राउज एवेन्यू कोर्ट की अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, प्रियंका राजपूत ने गुरुवार को शिकायतकर्ताओं, दिल्ली पुलिस और डब्ल्यूएफआई के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर सहित आरोपियों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा।
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बृजभूषण शरण सिंह। - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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अदालत ने गुरुवार को छह महिला पहलवान के यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के पूर्व प्रमुख बृज भूषण शरण सिंह व उनके सहयोगी के खिलाफ आरोप तय करने पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। अदालत 18 अप्रैल को फैसला देगी।

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फरवरी में बृज भूषण शरण सिंह ने कथित अपराध की रिपोर्ट करने में देरी और शिकायतकर्ताओं के बयानों में विरोधाभास का हवाला देते हुए मामले से बरी करने की मांग की थी। राउज एवेन्यू कोर्ट की अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, प्रियंका राजपूत ने गुरुवार को शिकायतकर्ताओं, दिल्ली पुलिस और डब्ल्यूएफआई के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर सहित आरोपियों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा।

इससे पहले कार्यवाही के दौरान शिकायतकर्ताओं और पुलिस ने कहा था कि आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सबूत है। दिल्ली पुलिस ने अभियुक्तों के इस तर्क को खारिज कर दिया था कि कुछ घटनाएं विदेशों में हुईं और इस प्रकार दिल्ली की अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं यह तर्क देते हुए कि यौन उत्पीड़न के कथित कृत्यों के लिए, विदेश में और दिल्ली सहित भारत में, बृज भूषण शरण सिंह को जिम्मेदार ठहराया गया था। 
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उनके वकील ने अदालत को बताया था कि ये घटनाएं 2012 में घटी बताई गई थीं, लेकिन पुलिस को इसकी सूचना 2023 में दी गई। इसके अलावा, उन्होंने कथित घटनाओं के समय और स्थानों में विसंगतियों का तर्क दिया था, और उनके बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं होने का दावा किया था।

दिल्ली पुलिस ने पिछले महीने अपनी दलीलें पूरी कर ली थीं। यह तर्क दिया गया कि कथित यौन उत्पीड़न की घटनाएं चाहे वे विदेश में हों या देश के भीतर, आपस में जुड़ी हुई हैं और एक ही लेनदेन का हिस्सा हैं। इसलिए, पुलिस ने कहा था कि अदालत के पास मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र है। दिल्ली पुलिस ककी और से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक अतुल श्रीवास्तव ने तर्क दिया था कि आईपीसी की धारा 354 के तहत मामला समय-बाधित नहीं है क्योंकि इसमें अधिकतम पांच साल की सजा का प्रावधान है।

शिकायत दर्ज करने में देरी के मुद्दे को संबोधित करते हुए श्रीवास्तव ने महिला पहलवानों के बीच डर का मुद्दा उठाया था और कहा था कि कुश्ती उनके जीवन में बहुत महत्व रखती है, और वे अपने करियर को खतरे में डालने की चिंताओं के कारण आगे आने में झिझक रही थीं।

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