कूड़े के इस धंधे का एक दूसरा पक्ष भी है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, मछली बाजार, मुर्गा मार्केट जैसी जिन जगहों पर ज्यादा और अच्छी क्वॉलिटी का कूड़ा मिलने की संभावना होती है, वहां पर सबको कूड़ा बीनने की अनुमति नहीं होती है। इन जगहों पर कूड़ा उठाने के लिए ठेका लेना पड़ता है, उसके बाद ही ठेका लेने वाला व्यक्ति अपने परिवार के साथ उस पूरी जगह का कूड़ा उठा सकता है।
आनंद विहार बस अड्डे पर कूड़ा उठाने की कीमत 30 से 40 हजार रुपये के लगभग प्रतिमाह का किराया चुकाना पड़ता है। आनंद विहार रेलवे स्टेशन का ठेका भी लगभग इसी कीमत के आसपास निकलता है। हालांकि, लॉकडाउन के बाद यात्रियों की संख्या में कमी के कारण इन कीमतों में कमी आई है। राजधानी की पॉश कॉलोनियों में भी कूड़ा उठाने के लिए एक निश्चित राशि का भुगतान करना पड़ता है। यह पैसा बिल्डिंग के सिक्योरिटी में लगे लोग आपस में ले लेते हैं। पैसा न देने पर वे कॉलोनी में कूड़ा उठाने के लिए किसी को अंदर जाने की अनुमति नहीं देते।
बड़े रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों पर कूड़े का ठेका मिल जाने के बाद ठेकेदार कुछ बच्चों, महिलाओं को कूड़ा उठाने के लिए दिहाड़ी मजदूरी पर रखता है। बच्चों को कूड़ा बीनने के लिए 200 रुपये और महिलाओं को 300-400 रुपये प्रतिदिन तक का भुगतान किया जाता है। इसके अलावा कुछ ठेकेदार खुद भी अपने परिवार के साथ कूड़ा उठाने का काम करते हैं।
कूड़ा उठाने वाले एक व्यक्ति के अनुसार, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर सफाई करने वाले सरकारी कर्मचारी नियुक्त होते हैं, लेकिन वे कभी-कभी केवल ड्यूटी पूरी करने के लिए सफाई करने आते हैं। इन कर्मचारियों, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन के कुछ अधिकारियों की मिली भगत से कूड़ा उठाने के लिए इस तरह की वसूली की जाती है।
कूड़ा उठाने वाली एक अन्य महिला नाजनीन ने बताया कि कूड़े उठाने वालों में एरिया बंटा हुआ होता है। कोई भी कूड़ा बीनने वाला किसी दूसरे की एरिया में नहीं जाता है। ऐसा करने पर कई बार मामला मारपीट तक पहुंच जाता है।
असलम की मां रोशनी (बदला हुआ नाम) ने अमर उजाला को बताया कि वे अपने पति और बच्चों के साथ मिलकर कूड़ा बीनने का काम करती हैं। पूरे परिवार को मिलाकर रोजाना 800-1000 रुपये तक की कमाई हो जाती है। वे गाजीपुर सब्जी मंडी के पास बनी झुग्गियों मेें रहती हैं। बच्चों की पढ़ाई का कोई इंतजाम नहीं है।
आंगनबाड़ी केंद्रों के खुलने पर बच्चे भोजन की उम्मीद में वहां चले जाते थे, लेकिन कोरोना काल में आंगनबाड़ी केद्र भी पूरी तरह बंद हैं, तो बच्चे भोजन की उम्मीद में इन किसान आंदोलनों, धरने-प्रदर्शनों और अन्य भीड़भाड़ वाले कार्यक्रमों के भरोसे चल रहे हैं।