सीबीआई की जांच शुरू होने के साथ ही यीडा ने भी कोआर्डिनेशन के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त कर दिया है। सूत्रों ने बताया कि यीडा में तैनात ओएसडी नवनीत सहगल को नोडल अफसर बनाया गया है। सीबीआई से होने वाले पत्राचार के मुताबिक सभी कागजात उपलब्ध कराएंगे।
जमीन खरीदने की कमेटी में प्लेसमेंट कर्मी
जिस समय ये जमीन खरीदने का निर्णय हुआ और कमेटी का गठन किया गया। उस समय के सभी विभागाध्यक्षों को बतौर सदस्य शामिल किया जाना था, लेकिन कुछ विभागाध्यक्षों ने खुद की जगह अपने विभाग में प्लेसमेंट पर तैनात कर्मियों को कमेटी में शामिल कर दिए।
जानकार मानते हैं कि इसके पीछे मकसद यही था कि भविष्य में अगर कोई जांच हो तो व न फंसें, क्योंकि उन्हें अनुमान था कि जिस तरह से मास्टर प्लान से बाहर जमीन खरीदी जा रही है ऐसे में इसकी जांच हो सकती है।
सीबीआई ने मथुरा जमीन घोटाले की जांच शुरू की है, जिसकी कीमत करीब 126 करोड़ रुपये है, जबकि उस समय करीब 3180 करोड़ रुपये की जमीन खरीदी गई थी। 2014 में मथुरा के सात गांवों मादौर, सेउपट्टी बांगर, सेउपट्टी खादर, कौलाना बांगर, कौलाना खादर, सौतीपुरा बांगर व नौहझील बांगर में 57.15 हेक्टेयर जमीन खरीदी गई, जिस पर 126 करोड़ रुपये खर्च हुए।
जहांगीरपुर में 765 केवी सबस्टेशन बनाने के लिए जमीन खरीदी गई। 2009 से 2013 के बीच यमुना प्राधिकरण के 15 गांवों में करीब 700 एकड़ जमीन खरीदी गई। इनमें बैराना, अलीपुर, भट्टा, अमरपुर पलाका, जहांगीरपुर, दयानतपुर, करौली बांगर, मेहंदीपुर बांगर, अनवरगढ़ बांगर, सुल्तानपुर, तकीपुर बांगर, मोहम्मदाबाद खेड़ा, भाईपुर ब्रह्मनान, नेवला गोपाल गढ़ और लतीफपुर बांगर शामिल हैं।
इन गांवों की जमीन पर कोई प्लान नहीं बना था, फिर भी प्राधिकरण ने खरीद ली। किसानों को इसका मुआवजा बांट दिया गया। हाथरस के मुढ़ावली गांव के किसानों से करीब 42 हेक्टेयर जमीन खरीदी गई थी। जमीन देने वाले किसानों को विकसित एरिया में सात फीसदी भूखंड देना था। इसकी आड़ लेकर 2013 में हाथरस में बड़े पैमाने पर जमीन खरीदी गई। यह जमीन भी मास्टर प्लान से बाहर की है। सीबीआई इन सभी प्रकरणों की जांच कर सकती है।