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डूसू चुनावः अमर उजाला राउंड टेबल कांफ्रेंस में बोले छात्र- नहीं चाहिए मूवी टिकट, फीस कम करवा दो

Tue, 03 Sep 2019 10:31 AM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • ‘अमर उजाला’ कार्यालय में डूसू चुनावों पर डीयू के विद्यार्थियों ने राउंड टेबल में साझा की समस्याएं 
  • छात्रों ने कहा- चुनाव से पहने नेता निकल आते हैं, मुद्दे की बात पर लड़ें तो बनें बात
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डूसू चुनाव पर राउंड टेबल कांफ्रेंस - फोटो : जी पाल
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विस्तार
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मतलब ही नहीं बनता कि हम उनके मूवी टिकट के झांसे में आ जाएं। या हम उनकी लेट नाइट पार्टी में जाकर देर रात तक शहर की सड़कों पर बीएमडब्ल्यू की सवारी करें। विभाग की लाइब्रेरी में पढ़ने के लिए किताबें हैं ही नहीं। पढ़ाने के लिए गुरु जी भी ठेके पर हैं।

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कॉलेजों की फीस आसमान छू रही है। मेस में खाने की बढ़ी हुई कीमतों के बारे में कोई सुनता नहीं। अब आप ही बताइये...मेट्रो में सफर के लिए हम कितने सालों से स्टूडेंट डिस्काउंट की मांग करते आ रहे हैं। छात्र नेता कानों में तेल डालकर बैठे रहते हैं।

जैसे ही चुनाव आया...सब सफेद कपड़ों में लंबी-लंबी गाड़ियों से निकल आते हैं। अब हम लोग अनपढ़ तो हैं नहीं, जैसे चाहे बरगला लें और हमारी वोट हासिल कर लें। हमारी बहुत छोटी-छोटी मांगें हैं। बहुत छोटी जरूरतें हैं। उनको छात्रसंघ के चुनावों में हिस्सा लेने वाली पार्टियों को अपने एजेंडे में प्रमुखता से शामिल करना चाहिए।
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हालांकि, ऐसा नहीं है कि हमारे मुद्दे शामिल नहीं होते हैं, लेकिन उन पर बाद में कभी जिम्मेदारों से ढंग से बात नहीं होती। नतीजतन, समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। ‘अमर उजाला’ ने सोमवार को अपने कार्यालय में दिल्ली विश्वविद्यालय में होने वाले चुनाव को लेकर राउंड टेबल कांफ्रेंस की। इसमें डीयू के अलग-अलग कॉलेजों के छात्र-छात्राओं से उनकी समस्याएं जानने की कोशिश की।

क्या हैं विद्यार्थियों की मांगें

फीस बढ़ा दी, अब नेता वही जो उसको कम करवा दे 
डीयू एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। इस बार कॉलेजों ने फीस बढ़ोतरी कर दी, लेकिन संसाधन नहीं बढ़ाएं हैं। विद्यार्थी ही जागरूक रहकर अपनी मांगों को छात्र नेता के सामने रखकर फीस वापसी करा सकते हैं। छात्र नेता वह किसी भी पार्टी का हो, इस समस्या को समझना चाहिए। हमारे इस मुद्दे को जो नेता आगे लेकर जाएगा हमारा वोट उसी का होगा।-अंकिता बिस्वास, बीएससी-मैथमेटिक्स, हिंदू कॉलेज

वोट वाले दिन छुट्टी ना मनाएं, अपनी बात रखें और वोट देने आएं 
हमारी भी छोटी-छोटी समस्याएं हैं। हम उनके लिए लड़ते हैं। मुझे मालूम है कि यदि हम जागरूक रहें तो जमीनी स्तर पर ही काफी चीजों को सुधारा जा सकता है। दूसरी और सबसे अहम बात यह है कि भले ही डूसू चुनाव हों, छुट्टी ना मानकर वोट देने जरूर जाएं। छात्र नेता से उम्मीद तभी कर सकेंगे जब उसके समक्ष अपनी बात को सही ढंग से समाधान निकालने के लिए रख पाएंगे। राज्य व राष्ट्रीय मुद्दे के प्रति जागरूकता भी छात्रों के मुद्दे सुलझाने में मदद कर सकती है।-भारत शर्मा, एलएलबी-थर्ड ईयर, कैंपस लॉ सेंटर

ठेके वाले गुरुजी कहते हैं...आज पढ़ लो कल पता नहीं हम आएं ना आएं
हमारे यहां तो गुरुजी तक ठेके पर हैं, कहते हैं आज पढ़ लो कल का पता नहीं हम आएं या न आएं। अब आप बताओ ऐसे में हमारा क्या भविष्य होगा? हमारे यहां फीस का सबसे बड़ा मुद्दा है। फीस इतनी ली जा रही है, लेकिन उनके मुकाबले में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। डीयू का छात्र होने के बावजूद हमारे साथ सौतेला सा व्यवहार होता है। छात्र नेता से हमारी उम्मीद है कि वह हमारी समस्याओं को सुनकर उन्हें सही प्लेटफॉर्म पर रखें और उसको दूर कराएं।-प्रांशू, दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म
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सालों से कह रहे मेट्रो में रियायत मिलेगी
एनएसयूआई हो या फिर एबीवीपी सबके घोषणा पत्र में एक से मुद्दे, यू स्पेशल, हॉस्टल, लड़कियों की सुरक्षा, मेट्रो में रियायती पास जैसे मुद्दे कॉमन होते हैं। रियायती मेट्रो पास का मुद्दा अभी तक पूरा नहीं हुआ। मुद्दे उठते हैं, लेकिन हमें पता नहीं चलता कि क्या समाधान निकला। जो मुद्दे पूरे भी हुए हैं, उसमें हर छात्र संगठन दावा करता है। ऐसा कोई प्लेटफॉर्म हो, जहां उस मुद्दे के पूरा होने का पता चल सके। कुल मिलाकर छात्र राजनीति के लिए पारदर्शिता होनी चाहिए।-मोहम्मद अली, दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म
  
वोट देने का अधिकार नहीं दिलवा पाए, ये कैसी नेतागिरी
डूसू चुनाव में छात्र नेता के लिए टिकट का बंटवारा क्षेत्रीयता और जातिगत आधार पर होता है। ऐसे में उन्हें छात्रों की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं होता। हमारे लिए जरूरी है जो भी डूसू की कमान संभाले वह कम से कम इस तरह की राजनीति से ऊपर उठकर समस्याओं पर ध्यान दें। हमारे पास वोट देने का अधिकार ही नहीं है। साढ़े तीन सौ विद्यार्थी हैं। छात्रनेता आगे आएं। हमारी लड़ाई लड़ें। हमारी समस्याएं दूर कराएं। लेकिन चुनाव से पहले कोई आता ही नहीं है।-शाहिद अंसारी, दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म
  
90 हजार हॉस्टल की फीस देती हूं, कोई इसे कम कराए
डूसू चुनाव में कोई भी छात्र संगठन छात्रों के मुद्दे के बजाय अपने फायदे के लिए सोचते हैं। एक आम विद्यार्थी की समस्या से उन्हें मतलब नहीं रहता है। बस, चुनाव के समय कैंपस में सफेद कमीज में लंबी-लंबी गाड़ियों में छात्र नेता दिखाई देते हैं। सरकारी विश्वविद्यालय के राजीव गांधी हॉस्टल में हमें इतनी फीस देनी पड़ रही है कि कोई नहीं सुनता, लेकिन नेताओं को इससे कोई लेना-देना नहीं। उनको तो अब चुनावों में अपने वोट से मतलब है।-शिवानी, दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म

हमें फ्री मूवी टिकट और ना चाहिए बीएमडबल्यू की सैर
छात्र नेता हर साल कोई ना कोई वादे करते हैं, लेकिन उन्हें पूरा नहीं करते। छात्र की जरूरत पर घोषणा पत्र में कोई बात नहीं होती है। हम चाहते हैं कि दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के छात्रों को भी डूसू में वोट डालने का अधिकार मिले। इससे वह भी अपने नेता के चयन में सकारात्मक भूमिका निभा सकेंगे। कम से कम वोट के लिए फ्री मूवी टिकट का प्रलोभन नहीं दिया जाना चाहिए। हमें उनकी बीएमडब्ल्यू में घूमने का भी कोई शौक नहीं है। हमारे कैंपस में लाइब्रेरी ही बड़ी करवा दो। कम से कम किताबें तो पढ़ने को मिलेंगी।-सुमन शेखर, दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म
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