गुड़गांव वासियों के लिए सिरदर्द बन रही टूटी सड़कों की मरम्मत अब आस्ट्रेलियाई पेटेंट से कराई जाएगी। दावा किया जा रहा है इस पेटेंट से मरम्मत के बाद सड़कों पर बार-बार रिपेयर की जरूरत नहीं पड़ेगी। बारिश और वाहनों के अधिक दबाव को भी सड़कें आसानी से झेल सकेंगी।
नगर निगम ने पिछले दिनों सड़कों के टूटने के कारणों का पता लगाने के लिए एक खास सर्वे कराया। सर्वे में साफ तौर पर यह बात सामने आई कि शहर के अंदर की सड़कों के निर्माण के समय इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक प्रभावी नहीं है।
यहां की सड़कों के निर्माण में प्रयोग होने वाला पेटेंट बुहत पुराना हो चुका है। निर्माण सामग्री की दिनों-दिन घटती गुणवत्ता के बीच सड़कों को लंबे समय तक बारिश और वाहनों के दबाव से बचाना मुश्किल है। साथ ही सड़क निर्माण करने वाली एजेंसियों की लापरवाही भी सामने आई है।
दरअसल, किसी कंपनी को टेंडर देने के बाद अधिकारियों की ओर से न तो सामग्री की गुणवत्ता जांची जाती है और न ही बनाने के तौर-तरीकों पर गौर किया जा रहा है। इसी से पार पाने के लिए पिछले दिनों निगमायुक्त डॉ. प्रवीण कुमार ने आस्ट्रेलियाई कंपनी से संपर्क किया।
कंपनी अधिकारियों के साथ बैठक कर निगमायुक्त ने पेटेंट के बारे में पूरी जानकारी ली। उन्होंने कंपनी को सिलोखरा गांव की एक सड़क की मरम्मत की जिम्मेदारी सौंपी है।
निगम के चीफ इंजीनियर बीएस सिंगरोहा ने बताया कि ‘स्टैबिलिग इंडिया’ नाम से कंपनी है। सिलोखरा गांव की एक सड़क का चयन कर उसे ट्रायल के लिए दिया गया है।
क्या है ‘स्टैबिलिग’
स्टैबिलिग चूना, सिमेंट, प्राकृतिक जैविक कारबोनकेयस पॉलिमर का एक मिश्रण है। इसमें सीटू मिट्टी का भी इस्तेमाल होता है, जो परत को अभेद्य और सतह को अपार शक्तिशानी बनाता है। इससे सड़कें लचीली बनाई जाती है।
इस बारे में नगर निगम आयुक्त, डॉ. प्रवीण कुमार का कहना है कि, ‘दरअसल, यह रोड़ी-तारकोल और रोडी-सीमेंट-बजरी से अलग किस्म की तकनीक है। आस्ट्रेलिया में इस तकीनी का इस्तेमाल 20 सालों से किया जा रहा है। मिश्रण की इस तकनीकी से सड़कों के परिवहन और कंटेलर टर्मिनल, रेलवे ट्रैक, फुटपाथ, हवाई अड्डों के रनवे आदि का निर्माण किया जाता है। कंपनी का ट्रायल लिया जा रहा है। गुणवत्ता, खर्च और दूसरी तमाम बातों पर गौर कर कंपनी से शहर की सड़कों के लिए करार किया जाएगा। तकनीकी बेहतर हुई तो शहर की सड़कों का निर्माण इसी से कराया जाएगा। बार-बार सड़कों की मरम्मत के खर्च से बचने के उपाय खोजना बहुत जरूरी है।’