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अपनी पुस्तक 'अंधकार काल' पर हुई चर्चा में ब्रिटिश काल पर शशि थरूर ने अमर उजाला से की खास बातचीत

Sat, 24 Mar 2018 02:44 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
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शशि थरूर और वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री - फोटो : अमर उजाला
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अंग्रेजों द्वारा बनाई गई संसदीय प्रणाली भारत के मुताबिक नहीं है। ब्रिटिश लोगों ने भारत को हर सूरत में लूटा और अपने देशों को विकसित किया। इतना ही नहीं ब्रिटिश साम्राज्य में हिन्दुस्तान में रंगभेद के आधार रूल ऑफ लॉ भी चलाया।

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ये शब्द इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में कलम श्रृंखला में अपनी पुस्तक 'अंधकार काल' (भारत में ब्रिटिश साम्राज्य) पर चर्चा के दौरान पुस्तक के लेखक शशि थरूर ने कहे। थरूर भारतीय राजनीतिज्ञ और पूर्व राजनयिक हैं, जो वर्तमान में केरल के थिरुवनंतपुरम से लोक सभा सांसद हैं।

यह चर्चा कलकत्ता की प्रभा खेतान फाउंडेशन और दिल्ली की दिनेश नंदिनी रामकृष्ण डालमिया फाउंडेशन तथा अहसास के सौजन्य से आयोजित कलम कार्यक्रम में बतौर मीडिया पार्टनर अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्रिहोत्री और शशि थरूर के बीच हुई।
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इस कार्यक्रम को श्री सीमेंट द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस मौके पर हिन्दी साहित्य जगत से जुड़े विशिष्ट अतिथि कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे। कलम की यह हिन्दी लेखकों को प्रोत्साहित और सम्मानित करने के लिए दिल्ली में पहली सीरीज है।

इस मौके पर दर्शकों को भी पुस्तक के लेखक से सवाल पूछने का मौका मिला। वहाीं, दिनेश नंदिनी फाउंडेशन में अर्चना डालमिया और निलिमा डालमिया ने कार्यक्रम का संचालन किया। कार्यक्रम में प्रभा फाउंडेशन से संदीप बुटोरिया समेत अन्य लोग भी उपस्थित थे।

शशि थरूर ने साझा किए अनुभव

- फोटो : अमर उजाला
शशि थरूर की पुस्तक 'अंधकार काल' (भारत में ब्रिटिश साम्राज्य) में ब्रिटिश काल में भारत के साथ हुए अन्यायों के हर पहलू को दर्शाया गया है। इस पुस्तक में ब्रिटिश साम्राज्य के देश पर पड़े दुष्प्रभावों के बारे में बताते हुए लेखक ने देश के प्रति अपनी आस्था प्रकट करने का प्रयास किया है। पुस्तक पर हुई चर्चा में पत्रकार विनोद अग्रिहोत्री ने शशि थरूर से सवाल जवाब करते हुए भारत की पृष्ठभूमि से कार्यक्रम में मौजूद दर्शकों को अवगत कराया।

अपनी पुस्तक पर चर्चा शुरू होने से पहले शशि थरूर ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक डिबेट कार्यक्रम के दौरान अपने अनुभव को सांझा करते हुए, अपने उस भाषण का जिक्र किया जिसकी वजह से वह डिबेट जीत गए और इतना ही नहीं उसके बाद उनके भाषण को इंटरनेट पर भी डाल दिया गया।

उनके देश पर दिए गए भाषण को 24 घंटे में 30 लाख से ज्यादा लोगों ने पढ़ा। इसके बाद भारतीय प्रकाशनों ने उनके इस अनुभव पर पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद उन्होंने लेखन की ओर रुख किया।
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इन तथ्यों पर हुए सवाल जवाब 

सवाल-1. विनोद अग्रिहोत्री ने थरूर से पहला सवाल पूछा कि पुस्तक में ब्रिटिश साम्राज्य की खामियों का ही जिक्र है, जबकि उनके द्वारा किए गए अच्छे कार्यों जैसे की रेलवे का निर्माण आदि का जिक्र नहीं है?
जवाब- सवाल के जवाब में बोलते हुए थरूर ने कहा कि अंग्रेजों ने रेलवे अपने फायदे के लिए बनाई, उन्होंने भारत में रेल चलाने के लिए भारतीयों से विदेशों में चलाई गई रेल पर हुए खर्च से नौ गुना ज्यादा की राशि वसूली, जो किसी भी तरह से भारतीयों के हित में नहीं था। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने भारतीयों को आंशिक रूप से दी गई सहूलियत के एवज में भी मोटी भरपाई वसूली।

सवाल-2. किताब में रूल ऑफ लॉ की बात की गई है, जो तथ्य दिए गए हैं वह कितने सही हैं?
जवाब-. थरूर ने कहा कि रूल ऑफ लॉ सिर्फ ब्रिटिश लोगों के लिए था, ब्रिटिश काल में जब भी भारतीयों के प्रति रूल ऑफ लॉ की बात हुई, तब रंगभेद के आधार पर रूल ऑफ लॉ चलाया गया, जिससे भारतीयों को कड़े कष्टों का सामना करना पड़ा।

सवाल-3. पुस्तक में दलितों के बारे में जिक्र नहीं है, ऐसा क्यूं। ब्रिटिश काल में दलितों को बढ़ावा मिला?
जवाब- थरूर ने कहा कि ये बात काफी हद तक ठीक है कि उन्होंने अपनी पुस्तक में दलितों के बारे में जिक्र नहीं किया। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश काल में दलितों को शिक्षा का अधिकार मिला, जिससे उनके जीवन का विकास भी हुआ, लेकिन अंग्रेजों ने शिक्षा प्रणाली में दलितों की हिस्सेदारी करवा कर जातिवाद को कुछ हद तक कम करवाया, लेकिन नौकरियों में अंग्रेजों ने भारतीय मूल के किसी भी शख्स को तवज्जो नहीं दी।

सवाल-4. अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति को किस तरह से समझते हैं आप? 
जवाब-थरूर ने कहा कि अंग्रेजों ने हमेशा भारतीयों में फूट डालकर राज किया। उन्होंने पैसे देकर मुस्लिम लीग की स्थापना करवाई, जिससे हिन्दू और मुस्लिमों में भेदभाव होना शुरू हुआ। 

सवाल-5. संसदीय प्रणाली में लोकतंत्र को किस हद तक सही मानते हैं? 
जवाब- थरूर ने कहा कि बेशक भारत में लोकतंत्र है, लेकिन संसदीय प्रणाली देश के मुताबिक तैयार नहीं की गई। यह संसदीय प्रणाली अंग्रेजों के छोटे से देश के लिए तैयार की गई थी, जिसे आजादी के बाद भारतीयों ने अपना लिया। बेशक हम आजाद हैं, लेकिन आज भी लोकतंत्र देश के मुताबिक नहीं है।
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