दादरी में बदमाशों से मुठभेड़ में शहीद दारोगा अख्तर खान का पार्थिव शरीर देर शाम उनके घर नगला पटवारी गली नंबर 5 में पहुंच गया। पार्थिव शरीर के पहुंचते ही माहौल बेहद गमगीन हो गया।
सबसे ज्यादा बुरा हाल पत्नी और बच्चों का था। उन्हें लोग संभाल नहीं पा रहे थे। अंतिम दर्शन के लिए लोगों की भीड़ जमा थी। इस दौरान परिजनों ने साथियों के भागने पर अख्तर की हत्या की बात कही। साथ ही साथियों के खिलाफ आवाज उठाने की बात कही।
देर शाम उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। अख्तर मूल रूप से नगला पटवारी गली नंबर पांच में रहते हैं। घर में पत्नी रजिया बेगम के अलावा बेटा अनस एक निजी स्कूल में 7वीं क्लास में पढ़ता है, जबकि बेटी राबिश तीसरी व छोटा बेटा अयान दूसरी कक्षा में पढ़ता है।
1977 में ज्वाइन की थी अख्तर ने नौकरी
शहीद दारोगा के बच्चे
- फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, अलीगढ़
पास में ही रहने वाले सगे भाई यामीन अहमद ने बताया कि अख्तर ने बतौर सिपाही 1977 में पुलिस सेवा में नौकरी शुरू की और प्रमोशन पाकर दरोगा बन गए। वह बेहद ईमानदार था। अब तक जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार रात उनके साथी उन्हें छोड़कर भाग गए। इसलिए बदमाशों ने घेरकर उन्हें मार दिया। साथियों की इस हरकत के खिलाफ हम आवाज उठाएंगे और जरूरत पड़ी तो धरना देंगे।
दादरी में सोमवार सुबह अचानक गोलियों की आवाज सुनकर आसपास रहने वाले लोगों की नींद तो खुल गई, लेकिन डर के चलते बाहर नहीं निकले। सवेरे आठ बजे तक घरों के दरवाजे बंद रहे। गली के दोनों ओर के रास्ते को बंद कर दिया गया था।
लोग घर के अंदर से ही झांककर माजरा देखने का प्रयास कर रहे थे। गली में उनको पुलिस ही दिखाई दे रही थी। आसपास के लोगों ने बताया कि घटना के दौरान अगर वे बाहर आते तो उनको अनावश्यक रूप से पुलिस पूछताछ के नाम पर परेशान करती। वहीं, बदमाश भी इसी गली में रहते हैं। उनसे भी रंजिश बनने के डर से लोग चुप्पी साधे हुए है।