अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) प्रति माह कानूनी लड़ाई में वकीलों पर लाखों रुपये खर्च करता है। वकीलों का कोई पैनल नहीं होने से मनमाने तरीके से वकील हायर करने के आरोप भी लगते हैं और सरकार की ओर से तय राशि से कई गुना ज्यादा फीस वकीलों को दी जाती थी।
इस प्रक्रिया को बंद करने के लिए एम्स-प्रशासन ने वकीलों का एक पैनल तैयार किया था, लेकिन कई महीनों से फाइल स्वास्थ्य मंत्रालय में अटकी है। सूत्रों के मुताबिक एम्स प्रशासन ने उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) और निचली अदालतों के लिए लगभग 10 वकीलों का पैनल तैयार करके फाइल जून-2014 में स्वास्थ्य मंत्रालय की अनुमति के लिए भेजी थी, लेकिन अब तक मंत्रालय से अनुमति नहीं मिल पाई।
इस वजह से अब भी एम्स में मनमाने तरीके से वकील हायर किए जा रहे हैं और उन्हें सरकार की ओर से तय राशि से ज्यादा फीस दी जा रही है। इसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ रहा है।
एम्स सूत्रों की मानें तो भारत सरकार के कानून और न्याय मंत्रालय ने वकीलों का पैनल तैयार करके सूची मांगी थी। उसके बाद करीब 100 वकीलों को शॉर्ट लिस्ट कर उनसे उनका बॉयोडाटा मांगा गया। योग्यता रखी गई कि कम से कम 20 वर्ष की प्रैक्टिस हो।
एम्स में जिस तरह के कोर्ट केस होते हैं, उसी तरह के विशेषज्ञ वकीलों का चयन किया गया। करीब 80 फीसदी कोर्ट मामले उपभोक्ता संरक्षण और सेवा से जुड़े थे, लिहाजा इस क्षेत्र में ज्यादा काम करने वाले वकीलों को प्राथमिकता दी गई। बता दें कि सरकार से तय राशि के मुताबिक प्रति तारीख सुप्रीम कोर्ट में 8,000 रुपये, हाईकोर्ट और कैट में 6,000 रुपये और निचली अदालत के लिए 1200 रुपये की राशि तय है।
विभिन्न अदालतों में एम्स के लंबित मामले
अदालत...........मामले
सुप्रीम कोर्ट........15
दिल्ली हाईकोर्ट....54
एसएटी..............56
निचली अदालत...65
राज्य आयोग......24
कुल..................214
किस वर्ष कितना खर्च हुआ
वित्त वर्ष राशि (रुपये)
2004-05...19,39,474
2005-06...22,97,414
2006-07...15,29,162
2007-08...16,54,170
2008-09...23,15,160
2009-10...55,48,890
2010-11...43,43,215
2011-12...22,95,898
2012-13...1,04,10,027