भूकंप के वैज्ञानिक दिल्ली को इसके व्यापक असर से बचाने की तैयारी में हैं। इसके लिए गांधीनगर के इंस्टीट्यूट ऑफ सिस्मोलॉजिकल रिसर्च के वैज्ञानिक नई तकनीक विकसित करने में लगे हैं।
इंस्टीट्यूट के महानिदेशक डा. बीके रस्तोगी के अनुसार किसी भी बड़े भूकंप को बनने में 30-40 सेकंड लगते हैं। हम इस कोशिश में हैं कि इसके बनने की स्थिति आरंभ होने के 5-10 सेकंड के भीतर इसकी तीव्रता की गणना कर लें और इसके महज कुछ सेकेंड बाद भूकंप वाले केन्द्र से 250 किमी से अधिक दूरी पर स्थिति क्षेत्रों को तत्काल इसी सूचना दे दी जाए। ताकि वे एहतियात बरत सकें।
अमर उजाला से बातचीत में रस्तोगी ने कहा कि भूकंप आने से पहले इसकी जानकारी ले लेने की विशेषज्ञता अभी किसी देश के पास नहीं है, लेकिन भूकंप आने के बाद इसकी तत्काल जानकारी लेने की पहल चल रही है।
ताकि सरकार उठा सके कुछ जरूरी एहतियात
इस दिशा में भारत के वैज्ञानिक भी काम कर रहे हैं। रस्तोगी का कहना है कि हिमालय क्षेत्र में भूकंप आने के बाद उसकी तरंगों को दिल्ली तक पहुंचने में करीब 40-50 सेकंड तक का समय लगेगा।
इस तरह से यदि हम समय रहते भूकंप के पैदा होने की सूचना प्राप्त करने में सफलता पा लेते हैं तो दिल्ली में इसका झटका पहुंचने के करीब 20 सेकंड पहले राजधानी को चेतावनी दे सकते हैं।
ऐसे में सरकार परमाणु बिजलीघर, एलएनजी समेत अन्य गैस पाइप लाइन आदि बंद करने की सावधानी बरत सकती है। ताकि भूकंप के झटकों के दिल्ली पहुंचने के बाद आग लगने और भीषण तबाही जैसी स्थिति से बचा जा सके।
मोबाइल एप्स, टीवी, से लोगों तक पहुंचेगी सूचना
इसके अलावा तकनीक के विकसित होने के बाद इसे मोबाइल एप्स, टीवी, रेडियो आदि के जरिए लोगों तक भी पहुंचाया जा सकता है ताकि लोग खुद को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा सकें और जान-माल की हानि जैसी जरूरी सावधानी बरती जा सके।
डा. रस्तोगी का कहना है कि अभी इस दिशा में काम चल रहा है। अभी इस विज्ञान को विकसित किया जाना है और इसमें एक-दो साल का समय लग सकता है।
भूकंप अनुसंधान संस्थान के निदेशक के अनुसार पूरी तकनीक को विकसित करने में पांच से सात साल का समय लग सकता है। इसमें सबसे बड़ी समस्या पृथ्वी के नीचे भूकंप तरंगों के बनने, उनके उर्जा के स्वरुप का सही अंदाजा लगा पाने को लेकर ही आ रही है, क्योंकि इतने न्यूनतम समय में बनने वाली उर्जा की तीव्रता की गणना काफी जटिल है।