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विशेष: रावण की मौत पर शोक मनाता है ये परिवार

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लंकेश रावण का दहन ज्यादातर लोगों के लिए जश्न का विषय है, लेकिन फरीदाबाद में एक बड़ा वर्ग इस दिन शोक मनाएगा। ये लोग आदि धर्म समाज से जुड़े हुए हैं। शहर में करीब पांच सौ परिवार ऐसे हैं जिनके लिए रावण आराध्य है। ऐसे लोगों के मंदिरों में रावण है और दिलों में भी।
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अपनी संतानों के नाम राक्षस कुल के लोगों के नाम पर रखकर वे समाज में इनके नाम पर होने वाली घृणा को मिटाने की मुहिम चला रहे हैं। वह कहते हैं राक्षस मतलब रक्षा करने वाला। मेघनाद, कुंभकर्ण, बर्बरीक, लंकेश, रावण, सुपर्णखा, तमसा, मंदोदरी, दावन और चांडाल उनके बच्चों के नाम हैं।

यह कोई कहानी और कल्पना नहीं बल्कि आधुनिक युग का सच है। लंकेश के कुनबे के नाम को आगे बढ़ाने के लिए उसके भक्तों ने समाज की धारा के विपरीत यह प्रथा शुरू कर दी है।
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इस वजह से समाज में झेलनी पड़ी जलालत

एक तरफ पूरे देश में शुक्रवार को रावण दहन के बाद खुशी प्रकट करने की तैयारियां जोरों पर हैं तो कुछ ऐसे लोग हैं जो इस दिन शोक मनाएंगे। आदि धर्म समाज से जुड़े अनिल चिंडालिया कहते हैं कि एक तरफ हमारा समाज यह कहता है कि रावण प्रकांड पंडित था तो दूसरी ओर उनके पुतले का दहन किया जाता है।

चिंडालिया शहर में रावण के अनुयायियों को बढ़ाने के काम में जुटे हुए हैं। इस समाज से जुड़े अनूप चिंडालिया ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि करीब पांच-छह साल पहले जब उन लोगों ने अपने बच्चों का नाम रावण के खानदान के लोगों की तरह रखना शुरू किया तो समाज की बहुत जलालत सहनी पड़ी।

स्कूल से बच्चों को डांटकर भगाया गया कि यह भी कोई नाम है। स्कूल में बच्चों को कहा गया कि इन राक्षसों का नाम लेना पसंद नहीं किया जाता है फिर क्यों इनका नाम रख लिया। उन्होंने अपनी बेटी का नाम तमसा रखा हुआ है। इसी तरह धीरे-धीरे सब ठीक हो गया। रावण के अनुयायियों के बच्चों के ऐसे ही नाम हैं।
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दिवाली के दिन भी शोक

चिंडालिया के मुताबिक रावण की पूजा वह लोग राजा के रूप में नहीं बल्कि उसके पांडित्य की वजह से करते हैं। वाल्मीकि समाज के इन लोगों के वाल्मीकि मंदिरों में रावण की फोटो लगाई गई है और पूजा होती है।

उनका कहना है कि समाज इतना आगे बढ़ गया फिर भी रावण के पुतले हर साल फूंकने से बाज नहीं आ रहा है। जबकि इससे पर्यावरण, पैसा और समय तीनों का नुकसान होता है। यह लोग दिवाली के दिन भी शोक मनाएंगे। इसके पीछे तर्क है कि इस दिन रामचंद्र जी ने शंबूक ऋषि का वध कर दिया था।

पूरे देश में बढ़ रहे हैं अनुयायी
आदि धर्म समाज से जुड़े लोगों का दावा है कि रावण के अनुयायी पूरे देश में लगातार बढ़ रहे हैं। वाल्मीकि समाज के धर्मगुरु शुक्राचार्य दर्शनरत्न रावण के बताने पर यहां करीब 20 साल पहले पांच-सात परिवारों ने रावण की पूजा शुरू की थी। चिंडालिया के मुताबिक उन लोगों को धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि उनके वंशज रावण ही हैं।
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