महिलाएं बोलीं- भोले बाबा हमारी सुनते हैं, वह हमारे साथ हैं इसलिए डर नहीं लगता
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। सावन की उमस भरी गर्मी में कांवड़ उठाए भगवा वस्त्रों में लिपटी महिलाओं की टोली जब बोल बम के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ती है तो साफ महसूस होता है कि यह सिर्फ यात्रा नहीं, आस्था और आत्मबल की अद्भुत मिसाल है। महिला कांवड़ियों के सामने कठिनाइयों की कमी नहीं है। गर्मी, भीड़, शौचालय और विश्राम स्थलों की कमी कई बार यात्रा को पुरुषों के मुकाबले और कठिन बनाती है लेकिन महिला कांवड़ियों का जोश, उनका अनुशासन और उनकी भक्ति उन्हें रुकने नहीं देती।
कांवड़ उठा चुकीं महिलाएं कहती हैं कि पहले यह यात्रा पुरुषों का क्षेत्र मानी जाती थी, लेकिन अब महिला कांवड़ियों की संख्या हर साल बढ़ रही है। कई महिलाएं समूह में यात्रा करती हैं तो कई अकेले निकल पड़ती है। उनका कहना है कि कांवड़ यात्रा सुविधाओं पर नहीं, संकल्प पर चलती है और उनका संकल्प मजबूत है। हालांकि, कई जगहों पर महिलाओं के लिए अलग टेंट, शौचालय और विश्राम स्थलों की व्यवस्था की गई है जिससे उनकी यात्रा कुछ हद तक सहज हुई है।
गुरुग्राम जिले की 28 वर्षीय रेखा यादव ने कहा कि हम अकेली नहीं हैं, बाबा हमारे साथ हैं। जब मन थकता है, तब भी पांव चलते हैं। यह सिर्फ श्रद्धा नहीं, विश्वास है जो हमें हर मुश्किल से पार ले जाता है। उनके साथ चल रही गुरुग्राम जिले की ही सीमा चौधरी ने बताया कि यह उनकी पांचवीं कांवड़ यात्रा है और हर बार उन्हें लगता है कि बाबा उनकी बात सुन रहे हैं। रेवाड़ी जिले की 55 वर्षीय कमला देवी कहती है कि वह पिछले तीन साल से अकेले हरिद्वार से जल लेकर आ रही है। शुरू में लोग हतोत्साहित करते थे लेकिन अब वो भी साथ देने लगे हैं। गंगाजल लेकर लौटती महिला कांवड़ियों की आंखों में श्रद्धा की नमी और चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक दिखती है। वे कहती हैं कि भले ही ये यात्रा कठिन हो, लेकिन बाबा तक अपनी बात पहुंचाने का यह सबसे पवित्र माध्यम है।