खराब बसों में सबसे अधिक उम्र पूरी कर चुकी बसें शामिल हैं। इनमें लो फ्लोर सीएनजी बसों के साथ ई-बसें भी शामिल हैं। रोजाना 10 से 15 ई-बसें खराब हो रही हैं। सबसे बड़ी परेशानी इन बसों को ठीक करने में आती है। दरअसल, जिस डिपो की बस होती है, उसी डिपो से मैकेनिक को बुलाया जाता है। इससे खराब बस को सड़क किनारे तक पहुंचाने में घंटों का समय लग जाता है। डीटीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस योजना पर कार्य किया जा रहा है कि जहां से बस खराब हो वहीं पास के डिपो से मैकेनिक आ जाए। मौजूदा समय में डीटीसी के बेड़े में अभी 3992 बसें हैं, जिनमें 488 ई-बसें भी शामिल हैं।
बसों की मियाद हो चुकी है पूरी
डीटीसी की मौजूदा सीएनजी बसों की उम्र 12 साल या साढ़े सात लाख किलोमीटर, जो पहले हो जाए निर्धारित थी, लेकिन बसों की स्थिति और बसों की कमी को देखते हुए सरकार ने इन्हें 15 साल तक चलाने की अनुमति दी थी। अब ये बसें अंतिम चरण में हैं। इनमें से इस साल से अगले साल तक 1500 बसें सड़कों से हट जाएंगी। वर्ष 2026 तक सड़कों पर गिनी चुनी हीं मौजूदा सीएनजी बसें बचेंगी। दिल्ली में 11,000 बसों की जरूरत है, लेकिन जरूरत के हिसाब से कम बसें उपलब्ध हैं। इसमें क्लस्टर और डीटीसी को मिलाकर संख्या 7360 तक ही पहुंचती है।
महज 26 डिपो मैनेजर
लगातार ब्रेकडाउन होने वाली बसों की मेंटेनेंस ठीक से नहीं हो पा रही है। पूर्वी, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर जोन को मिलाकर डीटीसी के कुल 40 डिपो हैं। इनकी देखरेख करने के लिए महज 26 स्टोर मैनेजर हैं। ऐसे में कई डिपो को एक मैनेजर को निगरानी करनी पड़ रही है। डीटीसी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि लंबे समय से इन डिपो मैनेजर की भर्ती नहीं हो रही है। इससे कोई भी कार्य सतर्कता के साथ नहीं किया जा रहा है।