नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गंगा प्रदूषण मामले पर दूसरे चरण (हरिद्वार से कानपुर) का फैसला देने से पहले कहा है कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश (यूपी) का मामला अलग-अलग तारीख पर सुना जाएगा। बेंच ने यूपी से जुड़े मामले पर सुनवाई के लिए अगली तारीख 25 अप्रैल तय की है। वहीं संबंधित मामले में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने मंगलवार को हलफनामा भी दाखिल किया।
हलफनामे के मुताबिक हरिद्वार से कानपुर के बीच गंभीर प्रदूषण फैलाने वाले 1070 उद्योगों की पहचान की गई है। इनके जरिये प्रतिदिन गंगा में 219.18 मिलियन लीटर (एमएलडी) अपशिष्ट की निकासी की जाती है।
अगली सुनवाई में बेंच इस हलफनामे पर भी गौर करेगा। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने याची अनिल सिंघला और एमसी मेहता मामले की सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया। यूपीपीसीबी की ओर से एडवोकेट प्रदीप मिश्रा ने एनजीटी में रिपोर्ट दाखिल की।
हलफनामा बता रहा गंगा की बदहाली
एनजीटी
यूपीपीसीबी के जरिए पहचान किए गए कुल 1070 उद्योगों में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अंतिम रूप से 746 उद्योगों को गंभीर प्रदूषण फैलाने वाला माना है। इन 746 उद्योगों के जरिए कुल 206.68 एमएलडी औद्योगिक अपशिष्ट की निकासी गंगा में की जा रही है। ठोस कचरे के निस्तारण को लेकर हलफनामे में बताया गया है कि हरिद्वार से कानपुर तक गंगा और उसकी सहायक नदी के किनारों पर कुल 31 कस्बे मौजूद हैं। इनमें से केवल 4 कस्बों में ही ठोस कचरे के निस्तारण संबंधी प्लांट मौजूद हैं।
इन कस्बों में कन्नौज, कानपुर, मुरादाबाद और बरेली का नाम शामिल है। इनमें से केवल कन्नौज का ही प्लांट चालू हालत में है। हलफनामे के मुताबिक यूपी सरकार कानपुर के प्लांट को फिर से चलाने की तैयारी में हैै। हलफनामे में बताया गया है कि सरकार ने 22 दिसंबर को अधिसूचना जारी कर पूरे राज्य में प्लास्टिक के निर्माण, आयात, स्टोर, बिक्री व परिवहन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है।
वहीं वाराणसी में गंगा के भीतर शव बहने के मामले पर याचिका दाखिल करने वाले एडवोकेट गौरव बंसल ने कहा कि इस रिपोर्ट से साफ है कि घरेलू और औद्योगिक दोनों तरीके के अपशिष्ट की निकासी बिना शोधन गंगा में की जा रही है। सरकार अपना दायित्व निभा पाने में पूरी तरह विफल है।