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युवाओं की नजर में आजादी के मायने

Fri, 15 Aug 2014 12:10 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा पर सही मायने में हम आज तक आजाद नहीं हो पाएं हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा मिलना बहुत दूर की बात दिखाई देती है। टीचर 8 बजे स्कूल में आते हैं और 11 बजे बंद करके वापस चले जाते हैं। स्कूल में दो टीचर है तो दोनों आपस में तय कर लेते हैं और एक ही स्कूल में आता है ऐसे में बच्चों को शिक्षा कैसे मिलेगी?
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सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि गरीब आदमी का जीना मुश्किल हो गया है। गांव के विकास के लिए स्वीकृत होने वाले पैसे में से दस प्रतिशत रकम भी गांव तक नहीं पहुंचती, ऐसी स्थिति में गांव का विकास कैसे संभव है?

आजादी के 60 सालों के बाद भी आज तक लोगों को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। हर दिन बलात्कार और हत्या जैसी घिनौनी घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। आज भी लोगों के अंदर पुलिस की छवि अंग्रेजों के शासनकाल की ही बनी हुई है। इसकी वजह भी पुलिस खुद ही है। रिपोर्ट लिखाने जाने पर पुलिस इतने सवाल करती है कि लोग पुलिस के पास जाने से भी डरते हैं।
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68वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आज भी हमारे सामने तमाम सवाल मुंह फैलाएं खड़े हैं पर हमें इनका जवाब ढूढ़ना होगा।

-सुबोध पंवार, मेल एड्रेस- panwarsubodh47@gmail.com

बाजार बन चुकी है श‌िक्षा

आज हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं पर ये कैसी आजादी जहां हर तरफ बस लूट ही लूट मची है। जब देश आजाद हुआ तो देश के संविधान निर्माताओं को पता था क‌ि शिक्षा ही देश को आगे तरक्की के रास्ते पर ले जा सकेगी।

पर देश के आजाद होने के सात दशक बाद हालत यह है क‌ि शिक्षा इस देश में सबसे बड़ा व्यापार बन चुकी है।

एक उदाहरण देखिए, यूटीयू में जिन छात्रों का बैक आया है उन्हें बैक पेपर देने के लिए प्रत‌ि विषय 2500 रूपए परीक्षा शुल्क देना होगा। इस तरह अगर किसी छात्र के 10 बैक हों तो उसे फॉर्म भरने के ल‌िए 25000 रूपए देने होंगे।

आखिर परीक्षा फार्म के नाम पर इतने रूपए लिया जाना कहां तक सही है। अगर छात्रों से इतने रूपए लिए परीक्षा फार्म के लिए इतने रूपए लिए जा रहे हैं तो अगर छात्रों की बैक आ रही है तो इतना पैसा लेने वाले इन कॉलेजों पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती। आखिर आजादी के 67 साल भी नागरिकों को ही लूटा जाता रहेगा तो फिर इस आजादी पर सवाल उठाए ही जाएंगे।

-नितिन राणा, मेल एड्रेस- nitinrana.uk@gmail.com

आज भी आजाद नहीं आधी आबादी

15 अगस्त 2014 को पूरा देश आजादी की वर्षगांठ मना रहा होगा। पर मैं सोचता हूं क‌ि ये कैसी आजादी है जहां आज भी इस देश की आधी आबादी खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर पा रही है।

देश की लड़कियां आज भी स्वतंत्र रूप से घर से बाहर नहीं निकल पाती हैं। सुरक्षा का आलम यह है क‌ि लड़की किसी काम के ल‌िए घर से बाहर जाती है तो जब तक सुरक्षित घर नहीं पहुंच जाती है पूरा परिवार च‌िंता में डूबा रहता है।

आजादी ने देश की महिलाओं को बराबरी का ‌अधिकार तो ‌दे दिया पर हमारा समाज आज भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने को तैयार नहीं है। ये आजादी तभी पूरी होगी जब हम महिलाओं से बराबरी का व्यवहार करेंगे।

अधिकार सिर्फ साथ चलने, साथ काम करने का ही नहीं क्योंक‌ि ये अधिकार तो कानून ने महिलाओं को दे दिया है। हमें अधिकार देना होगा क‌ि हम उन्हें घरों में, काम के स्थान पर उनके साथ अलग व्यवहार नहीं करेंगे। घर में, पारिवारिक संपत्ति में उन्हें हिस्सा देंगे। तब आजादी पूरी होगी।
-त्रिलोक रावत
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महिलाओं को देना होगा बराबरी का अधिकार

आजादी के हम हर साल स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं पर हमारे घरों में, समाज में आज भी लड़कियों की आजादी की बात नहीं की जाती। आज भी उन्हें अपनी जिंदगी के फैसले करने का हक नहीं है।

लड़कियां अपनी मर्जी से जीवनसाथी नहीं चुन सकती। और तो और महिलाओं का अपनी मर्जी के कपड़े पहनना भी हमें मंजूर नहीं होता। झूठी शान के नाम पर आज भी लड़कियों को मार दिया जा रहा है।

देश के संविधान ने देश की महिलाओं को जो अधिकार दिया उसकी वजह से आज देश में हर संस्थानों में महिलाएं ऊंचे से ऊंचे पदों तक पहुंची।

महिलाएं आज नौकरी कर रही हैं, पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हुए घर के जिम्मेदारी उठा रही हैं। पर आज स्थिति यह है क‌ि ऑफिसों में भी महिलाओं पर हिंसक घटनाएं होने लगी हैं।

सही मायने में तो हम आजाद तब होंगे जब महिलाएं अपनी जिंदगी अपने तरीके से जिएंगी, अपने फैसले खुद कर सकेंगी।
-‌‌ह‌िमानी रावत।
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