रिस्पना और बिंदाल जैसी नदियों के साथ ही शिवालिक घाटी से निकलकर सौंग नदी में मिलने वाली सुसवा नदी भी जबरदस्त प्रदूषण की गिरफ्त में है। किसी जमाने में सुसवा साग के लिए चर्चित सुसवा नदी में प्रदूषण का आलम यह है कि राजाजी टाइगर रिजर्व के वन्यजीव नदी का पानी पीने से कतराते हैं। सुसवा नदी के जल को लेकर किए गए वैज्ञानिक अध्ययन में यह बात सामने आई कि नदी में मैग्नीशियम, कैल्शियम से लेकर डिसोल्व ऑक्सीजन की मात्रा दोगुनी हो गई है।
वैज्ञानिक अध्ययन में पता चला कि नदी में कैल्शियम की मात्रा 216 मिलीग्राम प्रतिलीटर है जो कि निर्धारित मानक 75 और 200 से बहुत अधिक है। कैल्सियम की इतनी अधिक मात्रा के चलते यदि कोई नदी के पानी का इस्तेमाल करता है तो उसको गाल ब्लैडर, गुर्दे की पथरी समेत तमाम बीमारियां होने का बड़ा खतरा है। जहां तक मैग्नीशियम का सवाल है तो नदी के जल में मैग्नीशियम की मात्रा 194 मिलीग्राम प्रति लीटर पाई गई है जो निर्धारित मानक 100 मिलीग्राम प्रति लीटर से औसतन दो गुना है। बता दें कि रिस्पना और बिंदाल जैसी नदियां सुसवा नदी में जाकर मिलती हैं, जबकि सुसवा नदी लच्छीवाला के पास सौंग नदी में मिलती है। सौंग नदी आगे जाकर गंगा नदी में समाहित हो जाती है।
धूल फांक रही रिस्पना, बिंदाल नदियों के रिवर फ्रंट डेवलपमेंट की फाइलें
बता दें कि मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण की ओर से गुजरात के साबरमती और लखनऊ की गोमती नदी की तर्ज पर रिस्पना और बिंदाल नदियों को पुनर्जीवित करने को लेकर रिवर फ्रंट डेवलपमेंट की योजना तैयार की गई। 1750 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी योजना का मसौदा भी तैयार कर लिया गया, लेकिन 2018 से रिवर फ्रंट डेवलपमेंट की फाइलें कहां धूल फांक रही हैं इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं।
रिस्पना नदी को नया जीवन देने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की ओर से विशेष अभियान चलाया गया था। इसके तहत रिस्पना नदी में करीब 2.50 लाख पौधे रोपे गए थे। रिस्पना नदी मोथरोवाला के पास लगाए पौधों के आसपास सेना की ओर से बाउंड्री कर दी गई है।
मोथरोवाला के आसपास के लोगों ने बताया कि जहां पौधे लगाए गए थे, वहां सेना की ओर से चहारदीवारी की गई है। यहां कुछ पौधे तो बढ़ रहे हैं लेकिन कुछ झाड़ी के चलते बढ़ नहीं रहे हैं। लोगों ने कहा कि पौधों की देखरेख ठीक से न होने के चलते पौधे पनप नहीं पा रहे हैं।
पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस अभियान की शुरूआत केरवान गांव से की गई थी। जिसमें बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया था।
नदियों में पिंडदान कर अपनों को दी मुक्ति
हिंदू धर्म के अनुसार पवित्र नदी में अस्थि विसर्जन करने का बड़ा महत्व है, लेकिन बीती 26 अप्रैल से प्रदेश सरकार की ओर से लगाए कोविड कर्फ्यू के चलते लोग अस्थि विसर्जन के लिए हरिद्वार नहीं जा पाए। इसके चलते शहर के मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार करने के बाद लोगों ने आसपास की नदियों में ही अस्थि विसर्जन कर अपनों को मुक्ति दिलाई।
मई में शहर के तीनों मोक्ष धाम में कुछ दिनों तक अंतिम संस्कार का तांता लगा रहा। आलम यह रहा कि मोक्ष धाम फुल होने से अंतिम संस्कार के लिए लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ा। लक्खीबाग मोक्षधाम के पंडित अनिल शर्मा ने बताया कि अंतिम संस्कार के बाद अस्थि विजर्सन के लिए हरिद्वार न जाने के चलते कई लोगों ने आसपास की नदियों में ही अस्थियों का विसर्जन किया।
पंडित रमेश जोशी ने बताया कि लोग अभी भी मालदेवता और टपकेश्वर नदी में अस्थि विसर्जन कर रहे हैं। पंडित विनोद जोशी ने बताया कि अंतिम संस्कार के 10 दिन बाद अस्थि विसर्जन करने की मान्यता है। ऐसे में लोग आसपास की नदियों में ही अस्थियों का विसर्जन कर रहे हैं।