पर्यावरण के लिए शहरों से रोजाना निकलने वाला कचरा सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। दावे तमाम हैं, योजनाएं भी बन रही हैं लेकिन जमीन पर ठोस काम नहीं है। हालात यह हैं कि प्रदेश के शहरों से हर दिन 1551 मीट्रिक टन कचरा निकलता है, जिसमें से अभी केवल 60 फीसदी का ही निपटान होता है।
उत्तराखंड के 91 नगर निगम, निकायों में कचरा प्रबंधन लगातार बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एक तो आबादी में बढ़ोतरी और दूसरा बाहर से आने वाले पर्यटकों की संख्या में इजाफा, दोनों से ही कचरे को बढ़ावा तो मिल रहा है लेकिन सरकार के स्तर से इसके निस्तारण को लेकर अपेक्षाकृत कम तेजी ही देखने को मिल रही है।
शहरी विकास निदेशालय के अनुसार प्रदेश के 91 निगम, निकायों के सभी 1139 वार्डों से डोर-टु-डोर कूड़ा इकट्ठा किया जाता है। पूरे प्रदेश से रोजाना 1551 मीट्रिक टन कचरा निकलता है लेकिन इसमें से 60 फीसदी का ही निस्तारण हो पा रहा है। यानी करीब 930 मीट्रिक टन कचरा कहां जाता है, इसका कोई जवाब अधिकारियों के पास नहीं है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि निस्तारण से अलग जो कचरा बच रहा है, वह या तो नदियों-नहरों में डाला जा रहा है या फिर खुले में कहीं भी फेंक दिया जाता है। खुले में पड़ा हुआ कचरा पर्यावरण के लिए घातक है। एक ओर तो इसमें आग लगने की वजह से जो धुआं निकलता है, उसमें कई जहरीली गैस होती हैं तो दूसरी ओर नहरों-नदियों में फेंके जाने वाला कचरा बड़ा नुकसान पहुंचा रहा है।
कचरे से बिजली और तेल की योजना फाइलों में
शहरी विकास निदेशालय की कचरे से बिजली बनाने और कचरे से तेल निकालने की योजना कई सालों से फाइलों में है। वेस्ट टू एनर्जी का प्लांट रुड़की और वेस्ट टू ऑयल का प्लांट हरिद्वार में प्रस्तावित है।
उत्तराखंड करेगा दुनिया में सबसे पहले जीईपी की पहल
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का मार्ग सकल पर्यावरण उत्पाद(जीईपी) है। देश में अभी तक विकास को नापने का सूचक सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) है। लेकिन इसमें हवा, मिट्टी, पानी, जंगल कोई मतलब नहीं है। जीईपी को लेकर प्रदेेश सरकार का सकारात्मक है। जल्द ही उत्तरखंड दुनिया में सबसे पहले जीईपी की पहल करेगा। यह बात पर्यावरणविद् एवं हेस्को के अध्यक्ष पद्मविभूषण डॉ. अनिल जोशी ने कही।
उन्होंने कहा कि जिस पर विकास का पैमाना जीडीपी है। उसी तरह से पर्यावरण में जंगल, हवा, मिट्टी व पानी का आकलन जीईपी से किया जा सकता है। विकास व पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए जीईपी ही एक मार्ग है। देेश में विकास का सूचक जीडीपी है। लेकिन इसमें हवा, पानी, मिट्टी, जंगल का कोई मतलब नहीं है। जब हालात खराब होते हैं तब इस पर चर्चा होती है।
पानी खराब होने पर बोतल बंद और फ्यूरीफाई कर जीडीपी बढ़ जाती है। मिट्टी उर्वरक शक्ति खत्म होती है तो रसायन उद्योग लगते हैं। हवा प्रदूषित से लोग मरते हैं तो ऑक्सीजन का विकल्प है। जीडीपी यह नहीं बताती है कि हवा, मिट्टी, जंगल व पानी को कितना नुकसान हुआ है। नदियां सिकुड़ रही है और जंगलों का क्षेत्रफल कम हो रहा है।
प्रति वर्ष नदियों से बह जाने वाली उपजाऊ मिट्टी के आकलन से लेकर हवा के प्रदूषणों, ग्लेशियरों के पिघलने और वनों के बढ़ने व घटने संबंधी सूचनाएं संकलित कर इसका हिसाब रखा जाना चाहिए। पूरे देश में वन क्षेत्रफल 21 प्रतिशत है। जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 31 प्रतिशत है। वहीं, उत्तराखंड राज्य के कुल भू भाग का 71 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र का है। प्रदेेश् सरकार ने जीईपी को लेकर सकारात्मक पहल की है। जल्द ही उत्तराखंड दुनिया में सकल पर्यावरण उत्पाद की शुरूआत करने वाला पहला राज्य होगा।