छह से आठ तक होते हैं झुंड में
डॉ. बिलाल कहते हैं कि संख्या तय नहीं होती है। छह से आठ या दस तक भी झुंड में हो सकते हैं। इसमें अल्फा भेड़िया महत्वपूर्ण होता है। यह ग्रुप का लीडर होता है। यह रात के समय हलचल करते हैं। उस समय इंसानी गतिविधि भी कम होती है। यह काबू में आ जाए तो स्थिति को नियंत्रित करने में अधिक मदद मिलती है। अगर सावधानी की बात करें तो घर के आसपास सफाई रखें, झाड़ी आदि को हटा दें। रोशनी रखें। अगर आसपास के कई घर हैं तो एक जगह पर बच्चों को सुला सकते हैं।
1997 में कई जिलों में हुई थी घटना
उत्तराखंड वन विभाग से सेवानिवृत्त आईएफएस आरएन झा कहते हैं कि वर्ष 1997 में यूपी के प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, जौनपुर समेत कई जिलों में भेड़ियों का आतंक था। भेड़ियों के हमले की घटना फरवरी से शुरू हुई थी, जो अक्तूबर तक चली थी। उस अवधि में भेड़ियों के हमले की 75 घटनाएं हुई थी। उस समय एकीकृत यूपी था, उनको प्रतापगढ़ वन प्रभाग का डीएफओ बनाकर भेजा गया था। वहां एक योजना बनाकर अभियान शाम से सुबह तक चलाया गया। इस अवधि में 18 भेड़ियों को गोली मारी गई थी। वह कहते हैं कि भेड़िया बहुत चालाक होता है। अगर यूपी वन विभाग की टीम ने कई भेड़ियों को पकड़ लिया है तो यह भी बड़ी उपलब्धि है।
उच्च हिमालयीय क्षेत्र में भी भेड़िया का वास
उच्च हिमालीय क्षेत्रों में भी भेड़ियों का वास है। कुमाऊं में बागेश्वर के सुंदरढूंगा में 2014 में हिम तेंदुआ की उपस्थिति का पता लगाने के लिए कैमरा ट्रैप को लगाया गया था। डब्लूडब्लूआई के वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. विपुल मौर्य कहते हैं कि उस समय उत्तराखंड वन विभाग के साथ हिम तेंदुओं को लेकर अध्ययन चल रहा था, जब कैमरा ट्रैप में फोटो को देखा गया तो उसमें तिब्बती भेड़िये की फोटो थी, यह पहला तिब्बती भेड़िये के होने का पहला वैज्ञानिक साक्ष्य था।
डब्लूआईआई के विशेषज्ञ को यूपी भेजा गया
यूपी में घटना को देखते हुए एक डब्लूआईआई से एक विशेषज्ञ को भेजा गया है। डब्लूआईआई के पीआरओ डॉ बिलाल हबीब ने बताया कि भेड़ियों के जानकार डॉ. शहीर खान को भेजा गया है। वह यूपी वन विभाग की मदद करेंगे।
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