हिमालय के गुणगान का दिन
शायद इसीलिए उत्तराखंड ने एक दिन चुना है हिमालय के गुणगान के लिए। हिमालय दिवस देश-दुनिया की जुबान पर कुछ वर्षों से ही चढ़ा है। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर बीते पांच-छह वर्षों से हिमालय के सरोकार पर चर्चा और बचाने का संकल्प मजबूत हुआ है। उत्तराखंड इकलौता राज्य है, जहां से हिमालय दिवस की अवधारणा ने सत्तर के दशक में जोर पकड़ा और लगातार पैरवी में जुटा हुआ है। 1973 में जिस तरह 24 सौ पेड़ बचाने के लिए गौरादेवी आगे आईं और कुछ अन्य महिलाओं के साथ उन्हें कटने से बचा लिया।
वहीं, सुंदर लाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और गोविंद सिंह रावत आदि ने उस दौर में हिमालय की रक्षा के लिए प्रयास किए, जब दुनिया आने वाले खतरे से अनभिज्ञ थी। इस दौर में भी हिमालय पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन के अनिल जोशी आदि कई नाम हैं, जो नई पीढ़ी को आने वाले खतरों के प्रति सचेत कर रहे हैं।
अनदेखे खतरों को समझने और समझाने का प्रयास
संस्थाएं हिमालय दिवस के बहाने हर साल मानवता के भविष्य के खतरों, चिंताओं और मुद्दों से दुनिया को रूबरू करा रही हैं। राज्य ने 2014-15 में हिमालय दिवस को अधिकारिक तौर पर मान्यता दी थी। तब से यहां की सरकारें, सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं हिमालय दिवस में छुपे गूढ़ अर्थ के साथ हिमालय से जुड़े अनदेखे खतरों को समझने और समझाने का प्रयास कर रही हैं।
ये सच है छोटे से प्रयास ने हिमालयी राज्यों को आने वाले खतरों प्रति सचेत और एकजुट कर दिया है, लेकिन अभी तालमेल का अभाव स्पष्ट दिखता है। कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के पास जरूरी आंकड़े और पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। हिमालय के करीब वनस्पति के बदलाव, मौसम के खतरे, आपदा की पूर्व चेतावनी, उपग्रह से तस्वीरें आदि महत्वपूर्ण पहलुओं पर बहुत काम किया जा रहा, लेकिन तालमेल और जानकारियां साझा न होने से प्रयास बिखरे से दिखते हैं।
चमकदार ग्लेशियरों का बिखराव
उत्तराखंड में राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं में वाडिया इंस्टीट्यूट, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, आईआईटी रुड़की, इंडियन रिमोट सेंसिंग, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, ज्यूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, भारतीय वन्य जीव संस्थान, फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद आदि हिमालय को और अधिक करीब से समझने, वहां लगातार हो रहे बदलाव और दुष्प्रभावों पर अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में जलवायु के बदले मिजाज, चमकदार ग्लेशियरों का बिखराव और अन्य खतरों के साथ संस्थाओं की जांच-पड़ताल का दायरा भी बढ़ता जा रहा है।
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संवेदनशील उपकरणों से लैस तकनीकी लैब से निकल रहे निष्कर्ष, विषम परिस्थितियों में जमीनी पड़ताल, शोधपत्रों में खंगाली गई जानकारियों का भंडार हैं। साल में एक बार ही सही, हिमालय दिवस पर विशेषज्ञों के तर्क, विचार और सलाह आने वाले खतरों से चेता रहे हैं, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है आमजन की भागीदारी। समय है संस्थाओं के वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ावा देकर इस दिन को जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी के रूप में भी याद रखें।