तिब्बत में मौसम का मिजाज लगातार बदल रहा है। वहां के शुष्क और ठंडे रेगिस्तान में जहां नाममात्र बारिश होती थी या बर्फ गिरती थी, अब वहां झमाझम बारिश हो रही है।
आशंका है कि तिब्बत में हो रही इस बरसात से भारत में आफत आ सकती है। यह बात नेपाल से मानसरोवर से आगे तक गए भारत, चीन और नेपाल के संयुक्त अध्ययन दल के सामने आई है।
आने वाले दिनों में तीनों देश तिब्बत के बदलते मौसम के कारण और प्रभावों पर भी अध्ययन करेंगे।
तिब्बत में मौसम बदल रहा है
भारत से गए अध्ययन दल में शामिल रहे अपर सचिव (वन) और वन संरक्षक मनोज चंद्रन बताते हैं कि टीम करीब 1500 किमी की दूरी तय कर खासा-नेलम-सागा प्रयांग-मानसरोवर-दार्चिन होते हुए कैलास तक पहुंची।
देखा कि तिब्बत में मौसम बदल रहा है। इस शुष्क और ठंडे रेगिस्तान वाले इलाके में काफी बारिश हो रही है, जबकि स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां पर पहले बारिश नहीं होती थी।
इसके अलावा वनस्पति विहीन इस इलाके में अब हरियाली दिखाई देती है। तिब्बत का इलाका हिमालय के उत्तर में है। ऐसे में मानसूनी बादल के हिमालय से टकराकर नेपाल और हिंदुस्तान में तो बारिश करते थे, लेकिन तिब्बत में बारिश नहीं होती थी।
बरसात से बढ़ सकता है नदियों का जलस्त
अभी तक जो जानकारी है, उसके अनुसार वहां नाममात्र ही बारिश होती थी या फिर सिर्फ बर्फ ही गिरती थी। मानसरोवर क्षेत्र से ब्रह्मपुत्र, सतलुज, सिंधु करनाली आदि नदियों का उद्गम स्थल है।
ऐसे में यहां पर बरसात होने से नदियों का जलस्तर काफी बढ़ सकता है, जो भारत में मुसीबत ला सकती है। शुष्क इलाका होने के कारण इन क्षेत्रों में पानी सोखने की क्षमता भी नहीं है।
तीनों देशों ने तय किया है कि तिब्बत में मौसम के इस बदलाव के कारण, प्रभावों और रोकथाम को लेकर कार्य करेंगे।
दल में भारत सरकार के संयुक्त सचिव डॉ. बीएमएस राठौर, उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड अध्यक्ष राकेश साह, जीबी पंत पर्यावरण संस्थान कोसी कटारमल के निदेशक डॉ. पीपी ज्ञानी शामिल थे।
चीन, नेपाल, भारत कर रहे कैलास के भू-क्षेत्र का संरक्षण
बताते चलें कि कैलास के पवित्र भू-क्षेत्र संरक्षण परियोजना के तहत चीन, नेपाल और भारत चार साल से संयुक्त तौर पर संरक्षण के लिए कार्य कर रहे हैं।
इनका संयोजक संस्थान इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) काठमांडू में है। इसी सिलसिले में वैज्ञानिकों और अधिकारियों की मीटिंग काठमांडू में 22 जुलाई को हुई थी।
23 से 30 जुलाई तक दल काठमांडू से कैलास-मानसरोवर के अध्ययन के लिए गया।