जूनियर नेशनल वॉलीबाल चैंपियनशिप में उत्तराखंड की टीम में शामिल रुड़की के विशाल जोश और जज्बे से लबरेज नजर आते हैं।
जुनून ने हौसला दिया
मैच के दौरान साथियों संग उनका सहयोग और उत्साह देखते बनता है। लेकिन वे दुश्वारियों के ढेर से विशाल बने हैं। पिता के निधन के बाद विशाल टूट चुके थे। लेकिन खेल के प्रति जुनून ने उन्हें हौसला दिया।
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सुविधाओं और पैसे के अभाव के बावजूद विशाल ने शिखर की ओर बढ़ना शुरू किया। गुरबत से निकला यह खिलाड़ी अब राज्य वॉलीबाल के फलक पर उभरता सितारा है। चैंपियनशिप में उत्तराखंड के लिए जर्सी नंबर छह पहनकर उतरने वाले विशाल कुमार (17) प्रदेश की हर जीत में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
रुड़की के भारापुर भोरी गांव निवासी विशाल ने बताया कि उनकी पसंद ऊंची कूद थी, लेकिन बड़े भाई को गांव में खेलता देख वॉलीबाल में रुचि जगी। वर्ष 2007 में पहली बार वॉलीबाल पकड़ा और अगले ही साल स्टेट की टीम में खेलने का मौका मिल गया।
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जिस दिन टीम को खेलने के लिए रवाना होना था, उसी दिन हादसे में विशाल के पिता का निधन हो गया। विशाल खेलने नहीं जा सके। गरीबी की मार पहले से परिवार पर थी। अब खर्चे का जिम्मा बूढ़े दादा मोल्हड़ सिंह पर आ गया।
वर्ष 2011 में विशाल को स्कूल छोड़ना पड़ा, लेकिन वह वॉलीबाल को भुला नहीं सके। परिवार खेल का खर्चा नहीं उठा सकता, लिहाजा विशाल ने स्थानीय टूर्नामेंटों में भाग लेना शुरू किया।
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जीत से मिलने वाली रकम के भरोसे हर शाम गांव से करीब 15 किलोमीटर दूर हरिद्वार पुलिस लाइन में अभ्यास के लिए जाते हैं। 12वीं का प्राइवेट फॉर्म भर दिया है। पढ़ाई के साथ वॉलीबाल की प्रैक्टिस पर फोकस है।
सहारा मिले तो...
कम संसाधनों के बावजूद खेल के दम पर विशाल राज्य की टीम में तो शामिल हो चुके हैं, लेकिन प्रदर्शन जारी रखने के लिए उन्हें और सहारे की जरूरत है।
विशाल कहते हैं कि खर्चा खुद उठाता देख परिवार ने खेल की इजाजत तो दे दी, लेकिन जरूरी प्रशिक्षण और संसाधनों का खर्चा कैसे उठाएं? कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को पहचान दिलाने का सपना देखते हैं लेकिन...।
सोनिक और विक्रांत भी कमाल
उत्तराखंड वॉलीबाल टीम के लिफ्टर सोनिक सालार और अटैकर विक्रांत कुमार भी टीम के प्रमुख स्तंभ हैं। कुश्ती के शौकीन विक्रांत रुड़की के लिब्बरहेड़ी गांव के रहने वाले हैं।
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वर्ष 2007 में विक्रांत स्पोर्ट्स कॉलेज पहुंचे थे और यहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद जालंधर स्पोर्ट्स कॉलेज में आगे का प्रशिक्षण ले रहे हैं। रुड़की के ही सोनिक सालार स्पोर्ट्स कॉलेज में 10वीं के छात्र हैं।
क्रिकेट के शौकीन सोनिक को वालीबाल की जानकारी कॉलेज में मिली। कॉलेज में पहली बार उन्होंने यह गेंद देखी और फिर शुरू हो गया सीखने का सफर। यह सोनिक की लगन ही थी कि सोनिक न सिर्फ नेशनल चैंपियनशिप में टीम के लिफ्टर बने, बल्कि अपने से सीनियर खिलाड़ियों की कप्तानी का भी उन्हें मौका मिला।