दून के लोगों में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की अलख जगाने के उद्देश्य से आयोजित होने वाले विरासत पर नित नए विवाद खड़े हो रहे हैं। आयोजन की शुरुआत करने वाली संस्था के नाम पर अब अलग-अलग दावे हो रहे हैं।
दूसरी ओर, आयोजकों पर स्टाल संचालकों से मनमाने दाम वसूलने और लोककलाकारों की उपेक्षा के भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि दूनवासियों को देश-दुनिया के नामी कलाकारों की प्रस्तुतियों का पूरा मौका इससे मिलता है।
1995 से हो रहा है आयोजन
राजधानी में वर्ष 1995 से आयोजित हो रहे विरासत के जन्म पर भी विवाद शुरू हो गया है। सांस्कृतिक संस्था स्पिक मैके का दावा है कि दून में विरासत की शुरुआत संस्था ने ही की थी। हालांकि, कुछ समय बाद रीच संस्था इसका आयोजन करने लगी। उधर, रीच संस्था के पदाधिकारी इस दावे को नकारते हैं। उनका कहना है कि रीच ही शुरुआत से यह आयोजन करा रही है।
न रम्माण, न छोलिया सिर्फ छलावा...
जागर गायिका बसंती बिष्ट के कार्यक्रम में असम्मानित बर्ताव के विवाद से शुरू हुए ‘विरासत 2013’ में स्थानीय लोककलाकारों की उपेक्षा का सिलसिला थम नहीं रहा। कुमाऊं का प्रसिद्ध छोलिया नृत्य और अब यूनेस्को धरोहर रम्माण में भी आयोजक रीच संस्था ने छल कर डाला।
संस्था ने इन दोनों आयोजनों का नाम तो सूची में डाला, लेकिन कलाकारों को जानकारी नहीं दी गई। बुधवार को रम्माण का आयोजन प्रस्तावित था। इसे देखने सैकड़ों लोग विरासत में पहुंचे थे, लेकिन कलाकार नहीं आए तो उन्हें निराश लौटना पड़ा। कलाकारों ने आयोजन पर सवाल उठाते हुए कड़ी नाराजगी जताई है। इससे पूर्व यहां लगी फोटो प्रदर्शनी और पेंटिंग कार्यशाला में भी स्थानीय कलाकार न बुलाए जाने पर ऐतराज कर चुके हैं।
यह है रम्माण
जोशीमठ के सलूण-डूंगरा गांव में होने वाली रामायण को रम्माण कहा जाता है। माना जाता है कि मुखौटे पहनकर प्रस्तुत की जाने वाली यह रामलीला आदि शंकराचार्य के समय से आयोजित की जा रही है। दुनिया की इस सबसे पुरानी रामलीला को यूनेस्को ने वर्ष 2009 में विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया है।
स्पिक मैके ने आयोजन की शुरुआत की थी। दून के अलावा बाकी जितनी जगह विरासत का आयोजन होता है, वह स्पिक मैके ही कराता है।
-रूपी महेंद्रू, संयोजक, स्पिक मैके उत्तराखंड चैप्टर