कुमाऊं में हरेले की समृद्ध परंपरा रही है। पूर्व में परिजन अपने संबंधियों, घर से दूर प्रदेश में नौकरी करने वालों को हरेले के तिनके और देव मंदिर की अशीका (फूल) डाक से भेजते थे। आज भी कई परिवारों में यह परंपरा जारी है।
पौधरोपण, मृदा परीक्षण, मौसम चक्र का द्योतक है हरेला
हरेला पर्व पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है। इस पर्व से मौसम को पौधरोपण के लिए उपयुक्त माना जाता है। हरेला बोने के लिए उसी खेत की मिट्टी लाई जाती है जिसमें उचित पौधों के रोपण और अच्छी फसल का परीक्षण हो सके। सात या पांच प्रकार का अनाज बोया जाता है जो अनुकूल मृदा और मौसम चक्र का आभास कराता है। हरेला पर्व पौधरोपण, मृदा परीक्षण और मौसम चक्र का भी द्योतक है, लेकिन आज के दौर में वनों का जिस तरह दोहन हो रहा है, यह हमारी इस परंपरा पर कुठाराघात भी है।
-प्रो. अजय रावत, पर्यावरणविद
ऋग्वेद में भी है हरियाली के प्रतीक हरेले का उल्लेख
हरेला का शाब्दिक अर्थ हर + एला अर्थात हर भगवान संकर और एला स्त्री सूचक होने से माता पार्वती का आभाष कराता है। लोक परंपरा में हरेला त्योार पर्व बन गाय। ऋग्वेद में कृषि कृणत्व अर्थात खेती करो के तहत इसका उल्लेख है। इस त्योहार को मनाने से समाज कल्याण की भावना विकसित होती है।
-डॉ. नवीन चंद्र जोशी, प्रधानाचार्य, महादेव गिरी संस्कृत महाविद्यालय, हल्द्वानी
खेत की मिट्टी को जांचने का वैज्ञानिक तरीका है हरेला। पांच या सात प्रकार के अनाज को बोकर उसके अंकुरण से पता चलता था कि यह मिट्टी कैसी है और इस बार फसल कैसी होगी। इस परंपरा को त्योहार से जोड़कर युवा पीढ़ी जो आज खतड़ुवा, फूलदेई, हरेला जैसे पर्वों से दूर हो रही है, उसे इसके महत्व से रूबरू कराना है। युवा पीढ़ी भविष्य में इसके महत्व को समझे।
-डॉ. प्रभा, हल्द्वानी
तिलक, अक्षत, चंदन से होता है पूजन
सावन मास की शुरुआत शुभ दिन से की जाती है। हरेला का अर्थ हरियाली से है। हरेला के दिन इसे काटने के बाद तिलक, चंदन, अक्षत लगाया जाता है। घर के सभी बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे इसे शिरोधारण करते हैं। इस मौके पर सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य की कामना की जाती है। यह प्रकृति पूजन का प्रतीक भी है। यहां लोग पीपल, वट, आम, हरड़, आंवला आदि के पौधों का किसी न किसी रूप में पूजन करते हैं जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं।
-रेनू जोशी, समाजसेविका, हल्द्वानी