पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी पर्यावरण स्टेट्स रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में नौ हजार से अधिक जल स्रोत या तो सूख गए हैं या फिर सूूखने की कगार पर है। कई सदाबहानी नदियां अब मौसमी नदियों में तब्दील हो रही है। पेयजल स्रोतों के सूखने से गांवों की पेयजल योजनाओं को नए सिरे से बनाना पड़ रहा है।
ये है मनरेगा की स्थिति...
श्रमिकों की कुल संख्या-751696
कुल काम जो हो रहे है-59480
नया पंजीकरण कराने वाले श्रमिक-124161
कुल चिह्नित स्रोत-5611
कुल ग्राम पंचायतें जिनमें काम होना है-1994
जिन जल स्रोतों पर काम किया जाना है
नौले-736
धारे-3066
छोटी नदी-1359
गदेरे-289
अन्य नदियां-10
अन्य-151
-जिलों में यह कार्ययोजना जिलाधिकारी की देखरेख में संचालित की जाएगी। मुख्य विकास अधिकारी इसके नोडल अधिकारी होंगे।
-नोडल अधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी बनेगी। कमेटी के अध्यक्ष मुख्य विकास अधिकारी होंगे। जिला विकास अधिकारी को इसका सदस्य सचिव बनाया जाएगा। प्रभागीय वनाधिकारी, अपर जिलाधिकारी, जल निगम, जल संस्थान, सिंचाई के अधिशासी अभियंता, जिला प्रभारी जीआईएस प्रकोष्ठ इसके सदस्य होंगे। समिति-योजनाओं को स्वीकृति प्रदान करना, योजनाओं की समीक्षा, तकनीकी काम आदि करेगी।
-प्रत्येक विकासखंड के लिए एक जिला स्तरीय अधिकारी नामित किया जाएगा।
स्रोत संवर्द्धन समिति भी बनेगी
-ग्राम प्रधान की अध्यक्षता में स्रोत संवर्द्धन समिति बनेगी। यह समिति जल स्रोत का दौरा करेगी, कार्ययोजना तैयार करेगी और जल स्रोत की जीआईएस मैपिंग कराएगी। स्रोत का जैविक और अजैविक दोनों तरीके से उपचार किया जाएगा।
मनरेगा के तहत जल स्रोत को सुधारने का काम अब तेजी से किया जाएगा। देश में उत्तराखंड शायद पहला राज्य है जो इस तरह का काम मनरेगा के तहत कर रहा है।
- मोहम्मद असलम, स्टेट कोर्डिनेटर, मनरेगा