ज्योति ने बताया कि उनके पति आतंकी मुठभेड़ में घायल हुए तो वह पहली बार सेना के सीधे संपर्क में आईं। पता चला कि सेना अपने सैनिकों और उनके परिवारों का कितना ध्यान रखती है। इस बात ने उनके मन में सेना के प्रति सम्मान को कई गुना बढ़ा दिया। सेना की तैयारी में कई सैन्य अफसरों ने उनकी मदद की। उनके दोनों बच्चे भी उन्हें सेना में जाने को प्रेरित करते रहे। वह ओटीए में गई तब बच्चों ने इच्छा जताई थी कि उनकी वर्दी पर वह सितारे सजाएंगे। ज्योति ने अंतिम पग भरा तो दोनों बच्चों ने मां को गले लगा लिया।
अरुणाचल में हुई पहली तैनाती
लेफ्टिनेंट ज्योति नैनवाल की पहली पोस्टिंग अरुणाचल की पेंगा वैली में हुई है। उन्हें 11 दिसंबर तक ज्वाइन करना है। ज्योति एक बार फिर अपने बच्चों से दूर होंगी, लेकिन वह मानसिक रूप से तैयार हैं। वह कहती हैैं कि उनके बच्चों को समय ने बहुत कम उम्र में अपने लक्ष्य की ओर देखना सिखा दिया है। उनका भाई उनके बच्चों के लिए मां और पिता समान है। अगर उन्हें और दूर भी जाना पड़े तो उन्हें विश्वास है कि उनका भाई संभाल लेगा।
बेटी बनना चाहती है सेना में डॉक्टर
बेटी लावण्या कहती है कि वे भी मां को इसी तरह गर्व का मौका देंगी। पहले वह सिविल डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन जब से उनके पिता शहीद हुए हैं, तब से उनसे अपना लक्ष्य सेना में डॉक्टर बनने का कर लिया है। जिससे वह सैनिकों का इलाज कर सके। वहीं रेयांश भी सेना मेें अफसर बनना चाहता है।
ससुर ने कहा बहू पर फर्क है
शहीद दीपक के पिता व ज्योति के ससुर सीपी नैनवाल 10 गढ़वाल राइफल्स से आनरेरी कैप्टन रिटायर हैं। उन्हेें इस बात पर फख्र है कि बहू ने दो बच्चों की मां होकर भी शारीरिक रूप से कठिन सैन्य प्रशिक्षण की चुनौती को पार किया। नैनवाल कहते हैं कि फौजी बनना आसान नहीं। ज्योति ने कड़ी चुनौतियों को पार किया। दीपक सेना की घातक प्लाटून का हिस्सा थे और आठ साल जम्मू कश्मीर में सेवाएं दीं। सेना के लिए कई सफल आपरेशन किए। उनका बेटा, बहू के रूप में लौट आया है।