प्रदेश के अशासकीय महाविद्यालयों को अनुदान सूची में शामिल करने के नाम पर असल में नियुक्तियों का खेल चलता है। एक-एक महाविद्यालयों में सौ से अधिक पद सृजित किए गए हैं। विभागीय सूत्र बताते हैं कि एक पद के लिए 25 से 40 लाख रुपये तक की बोली लगती है।
इनके हाथ में होती हैं नियुक्तियां
शासन के सूत्रों के मुताबिक सरकारी महाविद्यालयों के शिक्षकों की नियुक्ति लोक सेवा आयोग के माध्यम से होती है। जिसमें पारदर्शिता बरती जाती है। जबकि अशासकीय महाविद्यालयों में महाविद्यालय, विश्वविद्यालय एवं उच्च शिक्षा निदेशालय की कमेटी नियुक्तियां करती हैं। जिसमें कई बार जमकर खेल होता है।
विचलन से अनुदान की मंजूरी दिए जाने पर भी सवाल
अशासकीय महाविद्यालय को अनुदान सूची में शामिल करने पर शासन के सवाल खड़ा किए जाने के बावजूद विचलन से उसे मंजूरी दिए जाने के आदेश पर भी सवाल खडे हो रहे हैं। सवाल यह है कि मामले को कैबिनेट में लाने के बजाए उसे विचलन से मंजूरी देकर इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई।
उत्तराखंड में उच्च शिक्षा उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 लागू है। यूपी में अब तक किसी भी अशासकीय महाविद्यालय को अनुदान सूची में शामिल नहीं किया गया। इसके अलावा केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम 2009 में भी स्पष्ट किया गया है कि एचएनबी गढ़वाल विवि से जितने अशासकीय महाविद्यालय संबद्ध हैं उन्हें न तो असंबद्ध किया जाएगा, न ही किसी अन्य महाविद्यालय को उससे संबद्ध किया जाएगा। इसके बावजूद महाविद्यालयों को संबद्ध कर उन्हें अनुदान सूची में शामिल किया जा रहा है। पूरा मामला भ्रष्टाचार से जुड़ा है।
- रविंद्र जुगरान, पूर्व अध्यक्ष युवा कल्याण परिषद
प्रदेश में अशासकीय महाविद्यालयों को अनुदान सूची में शामिल करने पर रोक के बावजूद उसे अनुदान दिए जाने के मामले को दिखवाया जाएगा।
- राधा रतूड़ी, अपर मुख्य सचिव उच्च शिक्षा