फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आपबीती: परिवार ने बनाई बुजुर्गों से दूरी, भीख मांगना मजबूरी, भरापूरा परिवार होने के बावजूद बेसहारा, तस्वीरें

Sat, 13 Nov 2021 01:32 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
1 of 5
हाथ फैलाना इनकी मजबूरी - फोटो : अमर उजाला
सड़क किनारे और मंदिरों के आगे बैठकर लोगों के सामने हाथ फैलाते बुजुर्गों को भले ही लोग हीनभावना से देखते हैं, लेकिन किसी के सामने हाथ फैलाना इनकी मजबूरी है। अपनों ने ही जब दूरी बना ली तो बुजुर्गों के सामने गैरों के आगे हाथ फैलाने की मजबूरी बन गई। कोई भरापूरा परिवार होने के बावजूद बेसहारा है, तो किसी के सामने परिवार को पालने की मजबूरी है। दिनभर सड़क किनारे बैठे इन बुजुर्गों की आपबीती बस यही समझ सकते हैं। आते-जाते किसी को तरस आ जाए तो कोई एक रुपया तो कोई दस रुपये हाथ में थमा देता है। देहरादून के कुछ मुख्य स्थानों पर यह बुजुर्ग हमेशा बैठे दिखाई देते हैं। पेट भरने और जीने के सवाल के कारण हर दिन सुबह ही यह बुजुर्ग सड़कों पर पहुंच जाते हैं। गांधी पार्क और चकराता रोड पर भीख मांगती बुजुर्ग महिलाओं की भीगी आंखों में छलकता दर्द उनकी आपबीती बयां कर रहा है। महज 25 साल की उम्र में पति का निधन होने के बाद तीन बेटों की जिम्मेदारी उरेई के सिर पर आ गई। लोगों के घरों में बर्तन धोने से लेकर दिहाड़ी मजदूरी कर उरेई ने तीनों बेटों को पाला।
 
विज्ञापन

2 of 5
उरेई - फोटो : अमर उजाला
उरेई ने परिवार को संभाला, लेकिन जब विकलांग मां को संभालने की बारी आई तो बेटों ने मुंह मोड़ लिया। न खाने को मिला न पहनने को। रोज बेटों के हाथों मार पड़ना उरेई के दिल को हर दिन छलनी करता था। उरेई ने बताया कि जब तक शरीर में ताकत थी, काम के लिए हाथ फैलाए, लेकिन आज मजबूरी में भीख मांगने के लिए हाथ फैला रही हूं। चकाराता रोड किनारे भीख मांगती बिहार की रहने वाली 70 वर्षीय उरेई देवी छह महीने पहले ही अपने किसी जानने के वाले के साथ दून पहुंची। यहां उन्हें हर महीने दो हजार रुपये अपने रिश्तेदार को देना होता है। सुबह दस बजे वह सड़क किनारे भीख मांगने बैठ जाती है। दिनभर में कोई एक रुपये देता कोई दस रुपये।
 
विज्ञापन

3 of 5
उरेई - फोटो : अमर उजाला
ऐसे में उरेई को महीने के दो हजार रुपये जुटाने की चिंता लगी रहती है। पेट के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाते समय उरेई की आंखें और चेहरे की भाव भंगिमाएं दर्द बयां कर रही थीं। रुंधे गले से उरेई ने बताया कि जब तक शरीर में ताकत थी मैंने काम करके खाया। परिवार को पाला, लेकिन आज शरीर में इतनी ताकत नहीं रही कि काम कर पाऊं, इसलिए आज हाथ फैलाने की मजबूरी है। बोलीं कि बूढ़ी हो गई। शरीर में काम करने की ताकत नहीं रही तो बेटों को बोझ लगने लगी। रोज के तानों और मार से पीछा छुड़ाने के लिए यहां आ गई। अब जब तक शरीर में कुछ जान बची है, ऐसे ही गुजारा करूंगी। बेटों ने कभी सुध नहीं ली यह कहते-कहते अपने पल्लू से आंखों के आंसू पोछे और उठकर चली गई। 

4 of 5
रमावती - फोटो : अमर उजाला
दस साल से पति के चल फिर नहीं पाने से रमावती के सामने सड़क पर बैठ लोगों के सामने हाथ फैलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा। रमावती की एक बेटी है, जिसकी वह शादी करा चुकी है। अब पति के अलावा रमावती का कोई नहीं है। बेटी पर बोझ नहीं बनाना चाहते। इसलिए बीमार पति के लिए दवा का इंतजाम और दो रोटी का जुगाड़ करने के लिए रमावती गांधी पार्क के सामने भीख मांगने के लिए बैठती है। रेलवे स्टेशन के पास एक झोपड़ी डालकर रह रही रमावती रोज सुबह गांधी पार्क के सामने भीख मांगने पहुंच जाती है। 68 वर्षीय रमावती रेलवे स्टेशन से लेकर गांधी पार्क तक पैदल भटकते-भटकते रात की रोटी का इंतजाम करती है। पति की दवाओं का भी इंतजाम हो जाए इस उम्मीद के साथ सुबह से शाम तक वह जगह-जगह पर भीख मांगती है।
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
- फोटो : फाइल फोटो
रमावती के पति दिहाड़ी मजदूरी कर घर चलाते थे, लेकिन पति के साथ ऐसी दुर्घटना घटी की वह अब चलने में असमर्थ हैं। दिहाड़ी मजदूरी से पति जो कमाता था उसी में रमावती खुशी से घर चलाती थी, लेकिन किस्मत ने ऐसा दिन दिखाया कि रमावती को मजबूरन लोगों के सामने हाथ फैलाने पड़े। पिछले दस साल से रमावती के पति बिस्तर पर हैं। बेटी की शादी कराई, लेकिन रमावती के जीवन से सम्मान से रोटी खाने का नसीब छिन गया। हर दिन बस इसी उम्मीद के साथ रमावती निकलती है कि पति की दवा का इंतजाम हो जाए। रमा ने बताया कि पति ही एक सहारा है। कहती है कि मुझे इस तरह भीख मांगता देख पति का दिल भी दुखता है, लेकिन कोई रास्ता भी नहीं है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें